मेरा मानना है कि श्री दिग्विजय सिंह जी कुछ ऐसे राज नेताओं मे से थे जो आम जनता की लड़ाई लड़ते थे । अपने वचन के पक्के थे । अपने सम्बन्ध लाभ हानि के हिसाब से नहीं तय करते थे । सही बात के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे । उन्होने जार्ज साहेब के लिए पार्टी से लड़ाई की , जार्ज साहेब के साथ तब खड़े थे जब पूरी पार्टी उनसे किनारा कर रही थी । दिग्विजय जी चन्द्रशेखर जी के करीबी थे , परन्तु ध्यान दीजिए, वी पी सिंह जी के निधन के बाद उनके अन्तिम संस्कार मे शामिल होने वाले चंद लोगो मे से एक दिग्विजय जी थे , जब कि मीडिया भी उस समय मुम्बई पर आतंकवादी हमलों पर केंद्रित था और बाकी लोग भी ।
राज्य सभा की सीट से इस्तीफ़ा दे कर लोक सभा निर्दलीय लड़ना , नितीश कुमार के विरोध के बाद भी जीतना , उनके बारे मे सब कुछ बता जाता है । वे बिहार मे एक नया किसान आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे वह शायद अब रुक जाये । ऐसे व्यक्ति का असमय जाना देश के लिए एक अपूर्णीय क्षति है ।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और उनके परिवार को इस दुख को सहने की क्षमता प्रदान करे यही प्रार्थना है ।
मनुष्य जीवन भर मंजिल की तलाश में भागता है और मंजिल उससे दूर होती जाती है, जैसे जल की तलाश में मृग मरू भूमि में मरीचिका का अनुभव करता है, संत कबीर के शब्दों में : पानी में है मीन पियासी
शुक्रवार, 25 जून 2010
सोमवार, 24 मई 2010
झारखंड का तमाशा - भारतीय जनता पार्टी की किरकिरी
एक कहावत सुनी थी चौबे चले छब्बे बनने दूबे बन कर लौटे । यह कहावत भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) पर पूरी तरह लागू होती है । कहां तो भाजपा केंद्र मे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को हिलाने की कोशिश मे बजट पर कटौती प्रस्ताव लायी और कहां झारखंड की अपनी साझा सरकार गवां बैठी ।
ज्यादा पुरानी बात नही है , यूपीए वन सरकार के अन्तिम वर्ष मे जब संयुक्त विपक्ष ने अपना अविश्वास प्रस्ताव पेश किया तब भी परिणाम ऐसा ही हुआ था । उस समय भी विपक्ष एकजुट नही रहा । संदेश यही गया था कि क्षेत्रीय दल जैसे समाजवादी पार्टी ( सपा) किसी भी हालत मे सत्ता के नजदीक या सत्ता मे बने रहना चाहते हैं अत: किसी भी समय कहीं भी चले जायेगें । अब तो यह याद करना मुश्किल हो गया है कि कब सपा वाम मोर्चे के साथ है और कब उनसे दूर । लेकिन उससे बढ़ कर मुख्य विपक्षी दल भाजपा के कई सांसद जिस तरह या तो यूपीए के पक्ष मे वोट डाले या गैर हाज़िर रहे उससे भाजपा की अनुशासित पार्टी होने की छबि को भारी धक्का लगा । भाजपा के सांसदों का पैसे के लिए हमेशा बिकने को तैयार रहने जैसे आरोप पर आम लोगों का विश्वास होने लगा । इसके साथ वोट फ़ॉर नोट मामला भी जिस तरह हैंडल किया गया उसने रही सही कसर पूरी कर दी । यह पहला मौका था जब एक राजनैतिक दल स्वंय अपने विरोधियों के उपर स्टिंग कर रहा था , अपने सांसदों का सहारा लेकर । लेकिन जिस टीवी चैनेल के सहारे स्टिंग किया गया वह बैक आउट कर गया तो कांग्रेस ने लगभग यह आरोप उलट कर भाजपा पर प्रायोजित कार्यक्रम द्वारा भ्रष्टाचार फैलाने और संसद मे नोट लहरा कर गरिमा को ठेस पहुंचाने का मेसेज जनता तक पहुंचा दिया । कांग्रेस को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी , आखिर कुछ महीने पहले ही पैसे लेकर प्रश्न पूछने के आरोप मे निकाले गये सांसदों मे भाजपा के सर्वाधिक सांसद थे । इस तरह उस समय भी सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का ही हुआ । उनके सांसद टूट गये , चैनेल ने स्टिंग मे साथ देने के बावजूद पूरा स्टिंग नही दिखाया और साथ ही साथ पूरा मीडिया भाजपा से थोड़ा दूर हो गया । यानी हर तरह से भाजपा की छबि धूमिल हुई । इसका खामियाज़ा चुनावों भुगतना पड़ा और भाजपा की लगभग २५ सीटें कम आयीं ।
यूपीए टू के एक साल खत्म होने से पहले लगभग वही हाल हो गया जब लोकसभा मे बजट प्रस्तावों पर कटौती प्रस्ताव लाया गया । इस बार ऐसा लग रहा था कि भाजपा बिना किसी तैयारी के जंग जीत लेने का गुमान पाले बैठी थी । ऐसा कहने का कारण यह है कि पार्टी १९९८ मे गिरधर गोमांग द्वारा मुख्य मंत्री रहते हुए लोकसभा मे वोट देकर वाजपेयी जी की सरकार गिराने का बदला चुकाने को बेताब दिखी , इसलिए शिबु सोरेन को झारखण्ड का मुख्यमंत्री होते हुए भी लोकसभा मे वोट डालने के लिए बाध्य किया । परन्तु यह प्रहसन हो गया क्योंकि शिबु सोरेन ने सरकार के पक्ष मे वोट कर दिया और ठीक उसके बाद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ डिनर करने पहुंच गये । इसके अलावा भाजपा के तीन सांसद अनुपस्थित रहे । यह सारी बातें एक अनुशासित , गंभीर और देश को विकल्प देने का दावा करने वाले दल की तो नहीं हो सकती ।
हद तो तब हो गयी जब भाजपा ने दिल्ली मे उच्च स्तरीय मीटिंग मे समर्थन वापसी का निर्णय ले लिया लेकिन जैसे ही शिबु सोरेन के पुत्र हेमन्त सोरेन ने भाजपा को सरकार बनाने का चारा फेंका , पार्टी ने आव देखा न ताव बस मुख्यमंत्री बनने और बनाने के फेर मे पड़ गयी , सारे नेता अपना अपना जुगाड़ बैठाने मे लग गये । लेकिन यह भी अन्तिम नहीं था , इस बीच कितनी बार झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और भाजपा मे सरकार साझा होने , केवल भाजपा की सरकार बनने और २८-२८ महीने सरकार बनाने का शिगूफ़ा छोड़ा गया बता पाना मुश्किल है । ऐसे मे एक बार खबर आना कि शिबु २५ मई को इस्तीफ़ा देगें और फिर शिबु सोरेन का यह बयान कि मै इस्तीफा नहीं दे रहा और मुख्य मंत्री बना रहूंगा , किसी उबाऊ प्रहसन के वीभत्स होने जैसा लगा । दिल कहने लगा "और नही बस और नहीं" ।
अब भाजपा ने थक हार कर समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को दे दिया , लेकिन अपनी पूरी किरकिरी कराने और उपहास का पात्र बनने के बाद । इन सारे प्रकरणों को देखने के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भाजपा का आदर्श राजनैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने का दावा केवल खोखला ही है ?
ज्यादा पुरानी बात नही है , यूपीए वन सरकार के अन्तिम वर्ष मे जब संयुक्त विपक्ष ने अपना अविश्वास प्रस्ताव पेश किया तब भी परिणाम ऐसा ही हुआ था । उस समय भी विपक्ष एकजुट नही रहा । संदेश यही गया था कि क्षेत्रीय दल जैसे समाजवादी पार्टी ( सपा) किसी भी हालत मे सत्ता के नजदीक या सत्ता मे बने रहना चाहते हैं अत: किसी भी समय कहीं भी चले जायेगें । अब तो यह याद करना मुश्किल हो गया है कि कब सपा वाम मोर्चे के साथ है और कब उनसे दूर । लेकिन उससे बढ़ कर मुख्य विपक्षी दल भाजपा के कई सांसद जिस तरह या तो यूपीए के पक्ष मे वोट डाले या गैर हाज़िर रहे उससे भाजपा की अनुशासित पार्टी होने की छबि को भारी धक्का लगा । भाजपा के सांसदों का पैसे के लिए हमेशा बिकने को तैयार रहने जैसे आरोप पर आम लोगों का विश्वास होने लगा । इसके साथ वोट फ़ॉर नोट मामला भी जिस तरह हैंडल किया गया उसने रही सही कसर पूरी कर दी । यह पहला मौका था जब एक राजनैतिक दल स्वंय अपने विरोधियों के उपर स्टिंग कर रहा था , अपने सांसदों का सहारा लेकर । लेकिन जिस टीवी चैनेल के सहारे स्टिंग किया गया वह बैक आउट कर गया तो कांग्रेस ने लगभग यह आरोप उलट कर भाजपा पर प्रायोजित कार्यक्रम द्वारा भ्रष्टाचार फैलाने और संसद मे नोट लहरा कर गरिमा को ठेस पहुंचाने का मेसेज जनता तक पहुंचा दिया । कांग्रेस को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी , आखिर कुछ महीने पहले ही पैसे लेकर प्रश्न पूछने के आरोप मे निकाले गये सांसदों मे भाजपा के सर्वाधिक सांसद थे । इस तरह उस समय भी सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का ही हुआ । उनके सांसद टूट गये , चैनेल ने स्टिंग मे साथ देने के बावजूद पूरा स्टिंग नही दिखाया और साथ ही साथ पूरा मीडिया भाजपा से थोड़ा दूर हो गया । यानी हर तरह से भाजपा की छबि धूमिल हुई । इसका खामियाज़ा चुनावों भुगतना पड़ा और भाजपा की लगभग २५ सीटें कम आयीं ।
यूपीए टू के एक साल खत्म होने से पहले लगभग वही हाल हो गया जब लोकसभा मे बजट प्रस्तावों पर कटौती प्रस्ताव लाया गया । इस बार ऐसा लग रहा था कि भाजपा बिना किसी तैयारी के जंग जीत लेने का गुमान पाले बैठी थी । ऐसा कहने का कारण यह है कि पार्टी १९९८ मे गिरधर गोमांग द्वारा मुख्य मंत्री रहते हुए लोकसभा मे वोट देकर वाजपेयी जी की सरकार गिराने का बदला चुकाने को बेताब दिखी , इसलिए शिबु सोरेन को झारखण्ड का मुख्यमंत्री होते हुए भी लोकसभा मे वोट डालने के लिए बाध्य किया । परन्तु यह प्रहसन हो गया क्योंकि शिबु सोरेन ने सरकार के पक्ष मे वोट कर दिया और ठीक उसके बाद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ डिनर करने पहुंच गये । इसके अलावा भाजपा के तीन सांसद अनुपस्थित रहे । यह सारी बातें एक अनुशासित , गंभीर और देश को विकल्प देने का दावा करने वाले दल की तो नहीं हो सकती ।
हद तो तब हो गयी जब भाजपा ने दिल्ली मे उच्च स्तरीय मीटिंग मे समर्थन वापसी का निर्णय ले लिया लेकिन जैसे ही शिबु सोरेन के पुत्र हेमन्त सोरेन ने भाजपा को सरकार बनाने का चारा फेंका , पार्टी ने आव देखा न ताव बस मुख्यमंत्री बनने और बनाने के फेर मे पड़ गयी , सारे नेता अपना अपना जुगाड़ बैठाने मे लग गये । लेकिन यह भी अन्तिम नहीं था , इस बीच कितनी बार झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और भाजपा मे सरकार साझा होने , केवल भाजपा की सरकार बनने और २८-२८ महीने सरकार बनाने का शिगूफ़ा छोड़ा गया बता पाना मुश्किल है । ऐसे मे एक बार खबर आना कि शिबु २५ मई को इस्तीफ़ा देगें और फिर शिबु सोरेन का यह बयान कि मै इस्तीफा नहीं दे रहा और मुख्य मंत्री बना रहूंगा , किसी उबाऊ प्रहसन के वीभत्स होने जैसा लगा । दिल कहने लगा "और नही बस और नहीं" ।
अब भाजपा ने थक हार कर समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को दे दिया , लेकिन अपनी पूरी किरकिरी कराने और उपहास का पात्र बनने के बाद । इन सारे प्रकरणों को देखने के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भाजपा का आदर्श राजनैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने का दावा केवल खोखला ही है ?
बुधवार, 19 मई 2010
गोरखा चौकीदार - एक परम्परा भरोसे की
आज रात मे देर से सोया, असल मे कहीं गया हुआ था और घर आने मे देर हो गयी । वैसे तो दिल्ली में यह कोई अजीब बात नही है , देर तो अक्सर हो ही जाया करती है । आज यह बात याद कर रहा हूं तो खास बात यह है कि जब मै गाड़ी पार्क करके सीढ़ियां चढ़ रहा था तो सीटी की आवाज के साथ सड़क पर डंडे पटकने की अवाज आयी । यह चौकीदार के आस पास होने की सूचना थी । यह आवाज तो जैसे मैं भूल ही गया था , मुझे अपना बचपन याद हो आया ।
मैं हाई स्कूल पास करके आगे की पढ़ाई के सिलसिले मे दिल्ली आया था । यहां ग्यारहवीं मे एडमीशन लिया था । मैं चूंकि छोटे से गांव से आया था , मेरी बड़े शहर के कुछ तौर तरीकों के बारे मे समझ कम थी , उनमे से एक यह चौकीदार वाली बात भी थी । हमारे गांव मे तो जब देर रात कुत्ते जोर से भौंकते थे तो बड़े बुजुर्ग , जो ऐसा लगता है रात को अक्सर कम ही सोते थे और एक तरह से चौकीदार की भूमिका मे होते थे , अपनी चारपाई पर लेटे -लेटे पुकार कर एक दूसरे को सावधान करते हुए कहते थे कि ध्यान देना शायद कोई चोर वगैरह तो नहीं है । परन्तु यहां मामला दूसरा था ।
असल मे मेरी शुरू से आदत थी कि मैं देर रात जाग कर ही पढ़ता था मुझसे सुबह उठ कर पढ़ाई कभी नहीं हुई । इस बात के लिए घर वालों से हमेशा शिक्षा - सलाह मिलती थी कि सुबह उठ कर पढ़ा करो सुबह दिमाग ताजा रहता है और पाठ जल्दी याद होता है । लेकिन मै सुबह जब भी पढ़ने की कोशिश किया मुझे नीद ही आयी , याद वाद कुछ नही हुआ । इस तरह मैं अपनी आदत के अनुसार रात मे देर तक जाग कर पढ़ता था, रात ११-१२ बजे के बाद कालोनी मे बिल्कुल सन्नाटा सा हो जाता था । उन दिनो दिल्ली मे ज्यादातर स्ट्रीट लाइटें टंग्स्टन बल्ब की ही होती थीं । सड़कों पर थोड़ा उजाला और थोड़ा अंधेरा होता था , आज जैसे मरकरी लाइट के बड़े - बड़े टावर नहीं होते थे । ऐसे मे चौकीदार की सीटी और उसके लाठी की आवाज सब को सुरक्षा का बोध देती थी । मै जब पढ़ाई मे ब्रेक करके बीच बीच मे थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर आ जाता और बालकॉनी मे छज्जे पर आधा झुका हुआ खड़ा होकर सड़क पार के पार्क की तरफ ऐसे ही शून्य मे देखता रहता था । उसी समय कभी कभी चौकीदार उधर से गुजरता , नीचे से ही पूछ लेता - क्या शाब अभी तक सोया नहीं ? पढ़ाई कर रहा था क्या ? मैं उत्तर देता हां , और कैसे हो ? उत्तर मिलता ठीक हूं और इस प्रक्रिया मे वह आगे निकल चुका होता । क्योंकि इस दौरान वह रुकता नहीं था सारी बात चलते चलते ही करता था । इनका नाम शेरबहादुर था जो उस समय करीब ५५ - ६० साल के रहे होगें ।
चौकीदारों की एक परम्परा सी थी , केवल बड़े लोग अपनी कोठियों पर चौकीदार रखते थे , जो ज्यादातर नेपाल के गुरखा जवान होते थे । बाकी कालोनियों मे सामुहिक तौर पर ये गुरखा जवान इसी तरह सीटी बजा कर और डंडा सड़क पर पटक कर पहरा देते थे । गुरखा लोगों की इमानदारी और वफ़ादारी अपने आप मे एक मिसाल है । यह अपने आप मे मानव इतिहास की सबसे बड़ी बिश्वास की धरोहर होगी जिसकी शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो जहां एक व्यक्ति , एक परिवार या कोई एक समूह नहीं बल्कि पूरे के पूरे समाज पर लोग ऐसा विश्वास रखते हों । पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अपनी सुरक्षा को उनके हवाले करके इतना निश्चिन्त हो जाते हों । आज कल कभी कभी ऐसे किस्से सुनने मे आ जाते हैं जिनमे नेपाल के लोग आपराधिक घटना मे संलिप्त हों , लेकिन उन दिनों ऐसी बात अजूबा थी । मुझे नहीं याद कि कोई ऐसी घटना मैने सुनी हो । मै नही जानता कि इनकी नियुक्ति कैसे होती थी , लेकिन ये खुद ही घर - घर जाकर, उन दिनों दो ( आजकल बीस ) रुपये वसूल करते थे । इस तरह एक स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कार्य कर रही थी ।
जिन दिनो मै कालेज पास किया उन्ही दिनों एक रात मुझे एक अजनबी चौकीदार रात मे दिखा , जो बिना बातचीत के आगे बढ़ गया । देखने मे उम्र मे भी कम था , मैने अगले दिन जब इस बारे मे पता किया तो पता चला कि पहले वाले बुजुर्ग चौकीदार ने अब रिटायरमेंट ले लिया है । उनके तीन बेटों और एक बेटी के परिवार ने इस काम को आपस मे बांट लिया है । इस तरह अब तीन तीन महीने ये चारों बारी बारी से चौकीदारी करेंगें । यह साधारण बात तभी समझ आयी कि हमारे मुहल्ले की चौकीदारी शेरबहादुर के परिवार के लिए एक संपत्ति है जिसे उनके परिवार ने आपसी समझौते मे बराबर से बांट लिया है । इस संपत्ति का कोई दस्तावेज नही था और न ही कोई रजिस्ट्री हुई थी । लेकिन परिवार की एक स्थाई आमदनी का ज़रिया थी जिसे परिवार ने मौखिक समझौते से बंटवारा कर लिया था । आज जब दिल्ली के ज्यादातर कालोनियों मे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसियेशन बन गयी है और उन्होने चारों तरफ से दीवार बनाकर गेट लगा दिये गये हैं । उन गेटों पर सुरक्षा एजेन्सियों के गार्ड तैनात रहते हैं , ऐसे मे यह सुनने मे अटपटी सी बात लग सकती है लेकिन हमारे मुहल्ले मे अभी भी वह पुरानी परम्परा कायम है ।
आज जब सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं अपने पुराने विचारों मे खोया हुआ अपने फ्लैट तक पहुंचा तो फिर नीचे वापस आ गया , मेरे मन मे यह जिज्ञासा हुई कि चौकीदार के परिवार के बारे मे पता करूं । मैं खड़ा होकर उसके आने का इन्तजार करने लगा । असल में अपनी जीविका के सिलसिले मे व्यस्तता के कारण मैं दिन भर घर रहता नही हूं दिन मे जब चौकीदार पैसा ले जाता है मै मौजूद नहीं होता इस लिए आज की स्थिति के बारे मे अनभिज्ञ हूं । इस बीच जैसे ही वह पास आया मैने बुला कर उसका नाम पूछ कर बात चीत का सिलसिला शुरू किया । आधे घंटे की बात से जो पता चला वह संक्षेप मे यह है कि आज जिनसे मेरी मुलाकात हुई वे श्यामबहादुर अपनी तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । शेरबहादुर इनके दादाजी थे , उनकी मृत्यु आज से पंद्रह साल पहले हो चुकी है । दूसरी पीढ़ी यानी श्याम के पिताजी की , वह भी रिटायर पर ही समझिये , उनमे से कुछ स्वयं आते हैं और कुछ के बच्चे । तीसरी पीढ़ी तक आते आते परिवार के हिस्सेदारों की संख्या बढ़कर पंद्रह हो गयी है । शेरबहादुर के चार बच्चों की अगली पीढ़ी मे किसी के दो , किसी के तीन और किसी के चार बच्चे हैं , इस तरह अब हर एक का नम्बर बराबर से नही आता । हिस्से के मुताबिक किसी का नम्बर जल्दी और किसी का देर से आता है । सारा बंटवारा मौखिक ही है । ये लोग अब चौकीदारी के साथ साथ सुबह कारें भी धोते हैं जिससे अतिरिक्त आमदनी होती है । अपनी बारी खत्म होने पर अगले आने वाले नये हिस्सेदार को कार धोने की संपत्ति भी पास कर दी जाती है । इस तरह चौकीदारी की पुरानी पूंजी के भले ही कई हिस्सेदार हो गये हों लेकिन नई पीढ़ी ने आमदनी का नया स्रोत - कार धुलाई का जोड़ कर आमदनी को बढ़ाया ही है ।
इसके बाद मैं उपर आ कर सोने चला गया लेकिन रात भर सोचता रहा कि मानवीय समबन्धों के कितने रूप हो सकते हैं और हम इतने पास रहकर भी कितनी बातों से अनजान रहते हैं या इतने व्यस्त रहते हैं कि जिनके भरोसे सब कुछ छोड़ दिया है उनके बारे मे कितना कम जानते हैं ।
मैं हाई स्कूल पास करके आगे की पढ़ाई के सिलसिले मे दिल्ली आया था । यहां ग्यारहवीं मे एडमीशन लिया था । मैं चूंकि छोटे से गांव से आया था , मेरी बड़े शहर के कुछ तौर तरीकों के बारे मे समझ कम थी , उनमे से एक यह चौकीदार वाली बात भी थी । हमारे गांव मे तो जब देर रात कुत्ते जोर से भौंकते थे तो बड़े बुजुर्ग , जो ऐसा लगता है रात को अक्सर कम ही सोते थे और एक तरह से चौकीदार की भूमिका मे होते थे , अपनी चारपाई पर लेटे -लेटे पुकार कर एक दूसरे को सावधान करते हुए कहते थे कि ध्यान देना शायद कोई चोर वगैरह तो नहीं है । परन्तु यहां मामला दूसरा था ।
असल मे मेरी शुरू से आदत थी कि मैं देर रात जाग कर ही पढ़ता था मुझसे सुबह उठ कर पढ़ाई कभी नहीं हुई । इस बात के लिए घर वालों से हमेशा शिक्षा - सलाह मिलती थी कि सुबह उठ कर पढ़ा करो सुबह दिमाग ताजा रहता है और पाठ जल्दी याद होता है । लेकिन मै सुबह जब भी पढ़ने की कोशिश किया मुझे नीद ही आयी , याद वाद कुछ नही हुआ । इस तरह मैं अपनी आदत के अनुसार रात मे देर तक जाग कर पढ़ता था, रात ११-१२ बजे के बाद कालोनी मे बिल्कुल सन्नाटा सा हो जाता था । उन दिनो दिल्ली मे ज्यादातर स्ट्रीट लाइटें टंग्स्टन बल्ब की ही होती थीं । सड़कों पर थोड़ा उजाला और थोड़ा अंधेरा होता था , आज जैसे मरकरी लाइट के बड़े - बड़े टावर नहीं होते थे । ऐसे मे चौकीदार की सीटी और उसके लाठी की आवाज सब को सुरक्षा का बोध देती थी । मै जब पढ़ाई मे ब्रेक करके बीच बीच मे थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर आ जाता और बालकॉनी मे छज्जे पर आधा झुका हुआ खड़ा होकर सड़क पार के पार्क की तरफ ऐसे ही शून्य मे देखता रहता था । उसी समय कभी कभी चौकीदार उधर से गुजरता , नीचे से ही पूछ लेता - क्या शाब अभी तक सोया नहीं ? पढ़ाई कर रहा था क्या ? मैं उत्तर देता हां , और कैसे हो ? उत्तर मिलता ठीक हूं और इस प्रक्रिया मे वह आगे निकल चुका होता । क्योंकि इस दौरान वह रुकता नहीं था सारी बात चलते चलते ही करता था । इनका नाम शेरबहादुर था जो उस समय करीब ५५ - ६० साल के रहे होगें ।
चौकीदारों की एक परम्परा सी थी , केवल बड़े लोग अपनी कोठियों पर चौकीदार रखते थे , जो ज्यादातर नेपाल के गुरखा जवान होते थे । बाकी कालोनियों मे सामुहिक तौर पर ये गुरखा जवान इसी तरह सीटी बजा कर और डंडा सड़क पर पटक कर पहरा देते थे । गुरखा लोगों की इमानदारी और वफ़ादारी अपने आप मे एक मिसाल है । यह अपने आप मे मानव इतिहास की सबसे बड़ी बिश्वास की धरोहर होगी जिसकी शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो जहां एक व्यक्ति , एक परिवार या कोई एक समूह नहीं बल्कि पूरे के पूरे समाज पर लोग ऐसा विश्वास रखते हों । पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अपनी सुरक्षा को उनके हवाले करके इतना निश्चिन्त हो जाते हों । आज कल कभी कभी ऐसे किस्से सुनने मे आ जाते हैं जिनमे नेपाल के लोग आपराधिक घटना मे संलिप्त हों , लेकिन उन दिनों ऐसी बात अजूबा थी । मुझे नहीं याद कि कोई ऐसी घटना मैने सुनी हो । मै नही जानता कि इनकी नियुक्ति कैसे होती थी , लेकिन ये खुद ही घर - घर जाकर, उन दिनों दो ( आजकल बीस ) रुपये वसूल करते थे । इस तरह एक स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कार्य कर रही थी ।
जिन दिनो मै कालेज पास किया उन्ही दिनों एक रात मुझे एक अजनबी चौकीदार रात मे दिखा , जो बिना बातचीत के आगे बढ़ गया । देखने मे उम्र मे भी कम था , मैने अगले दिन जब इस बारे मे पता किया तो पता चला कि पहले वाले बुजुर्ग चौकीदार ने अब रिटायरमेंट ले लिया है । उनके तीन बेटों और एक बेटी के परिवार ने इस काम को आपस मे बांट लिया है । इस तरह अब तीन तीन महीने ये चारों बारी बारी से चौकीदारी करेंगें । यह साधारण बात तभी समझ आयी कि हमारे मुहल्ले की चौकीदारी शेरबहादुर के परिवार के लिए एक संपत्ति है जिसे उनके परिवार ने आपसी समझौते मे बराबर से बांट लिया है । इस संपत्ति का कोई दस्तावेज नही था और न ही कोई रजिस्ट्री हुई थी । लेकिन परिवार की एक स्थाई आमदनी का ज़रिया थी जिसे परिवार ने मौखिक समझौते से बंटवारा कर लिया था । आज जब दिल्ली के ज्यादातर कालोनियों मे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसियेशन बन गयी है और उन्होने चारों तरफ से दीवार बनाकर गेट लगा दिये गये हैं । उन गेटों पर सुरक्षा एजेन्सियों के गार्ड तैनात रहते हैं , ऐसे मे यह सुनने मे अटपटी सी बात लग सकती है लेकिन हमारे मुहल्ले मे अभी भी वह पुरानी परम्परा कायम है ।
आज जब सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं अपने पुराने विचारों मे खोया हुआ अपने फ्लैट तक पहुंचा तो फिर नीचे वापस आ गया , मेरे मन मे यह जिज्ञासा हुई कि चौकीदार के परिवार के बारे मे पता करूं । मैं खड़ा होकर उसके आने का इन्तजार करने लगा । असल में अपनी जीविका के सिलसिले मे व्यस्तता के कारण मैं दिन भर घर रहता नही हूं दिन मे जब चौकीदार पैसा ले जाता है मै मौजूद नहीं होता इस लिए आज की स्थिति के बारे मे अनभिज्ञ हूं । इस बीच जैसे ही वह पास आया मैने बुला कर उसका नाम पूछ कर बात चीत का सिलसिला शुरू किया । आधे घंटे की बात से जो पता चला वह संक्षेप मे यह है कि आज जिनसे मेरी मुलाकात हुई वे श्यामबहादुर अपनी तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । शेरबहादुर इनके दादाजी थे , उनकी मृत्यु आज से पंद्रह साल पहले हो चुकी है । दूसरी पीढ़ी यानी श्याम के पिताजी की , वह भी रिटायर पर ही समझिये , उनमे से कुछ स्वयं आते हैं और कुछ के बच्चे । तीसरी पीढ़ी तक आते आते परिवार के हिस्सेदारों की संख्या बढ़कर पंद्रह हो गयी है । शेरबहादुर के चार बच्चों की अगली पीढ़ी मे किसी के दो , किसी के तीन और किसी के चार बच्चे हैं , इस तरह अब हर एक का नम्बर बराबर से नही आता । हिस्से के मुताबिक किसी का नम्बर जल्दी और किसी का देर से आता है । सारा बंटवारा मौखिक ही है । ये लोग अब चौकीदारी के साथ साथ सुबह कारें भी धोते हैं जिससे अतिरिक्त आमदनी होती है । अपनी बारी खत्म होने पर अगले आने वाले नये हिस्सेदार को कार धोने की संपत्ति भी पास कर दी जाती है । इस तरह चौकीदारी की पुरानी पूंजी के भले ही कई हिस्सेदार हो गये हों लेकिन नई पीढ़ी ने आमदनी का नया स्रोत - कार धुलाई का जोड़ कर आमदनी को बढ़ाया ही है ।
इसके बाद मैं उपर आ कर सोने चला गया लेकिन रात भर सोचता रहा कि मानवीय समबन्धों के कितने रूप हो सकते हैं और हम इतने पास रहकर भी कितनी बातों से अनजान रहते हैं या इतने व्यस्त रहते हैं कि जिनके भरोसे सब कुछ छोड़ दिया है उनके बारे मे कितना कम जानते हैं ।
शनिवार, 8 मई 2010
गालियां ही गालियां , बस एक बार सुन तो लें ( तर्ज - रिश्ते ही रिश्ते )
लोग गाली क्यों देते हैं ? गाली देने वाला गाली दे देता है परन्तु उसे पाने वाले की क्या मनो दशा होती है ? न्यूज एंकरों की भाषा मे कहें तो उसे कैसा लग रहा होता है ? मेरे विचार मे गालियां देने का मुख्य कारण दूसरे को नीचा दिखाना या अपमानित करना होता है । यह भी कहा जा सकता है दोस्तों मे मज़ाक मे भी गालियों का प्रयोग होता है और उसे अपमानित करने की मानसिकता के दायरे मे नही रखा जा सकता । इस बात मे दम तो नज़र आता है लेकिन अगर थोड़ा ध्यान से देखें तो पायेंगे कि दोस्तों मे गालियों वाले शब्दों का प्रयोग केवल यह साबित करने के लिए होता है कि हमारी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ है कि अपमानजनक शब्दों के बावज़ूद दोस्त बुरा नही मानता है । यहां भी अपमान मौजूद है लेकिन एक कसौटी की तरह जिस पर दोस्ती को कसा जा रहा है और उसकी प्रगाढ़ता को साबित किया जाता है ।
गालियां मोटे तौर पर दो तरह की होती हैं , आम बोल चाल की भाषा मे हम एक को वेज ( श्लील ) और दूसरे को नॉन वेज ( अश्लील ) कहते है । वेज गालियों की श्रेणी मे वे गालियां आती जो आम तौर पर रिश्तों पर केंद्रित न होकर गुणों पर ज्यादा केंद्रित होती हैं जैसे किसी को कम-अक्ल बताने के लिए गधा या उल्लू कहा जाता है या किसी को तुच्छ या अति चापलूस बताने के लिए कुत्ता कहा जाता है । कुछ कम स्तर की गालियां ( वैसे कुछ लोग इन्हे गाली नही मानते ) भी हैं जैसे जब कोई छात्र बिना अर्थ समझे और आत्मसात किये अपने पाठ का रट्टा लगाता है तो उसे तोता - रटन्त से सम्बोधित करते हैं । नॉन वेज गालियां रिश्तों और रिश्तेदारियों पर केंद्रित होती हैं । ये उन रिश्तों के मूलभूत तत्व को सरेआम उजागर करके आपको अपमान सहने वाली अवस्था मे ला खड़ा करती हैं । वैसे देखा जाय तो रिश्ते इंसान को इंसान बनाते हैं परन्तु उन्ही रिश्तों का जिक्र गालियों के रूप मे , उसे हैवान बना देता है । ऐसा क्यों होता है ? इसका सीधा सपाट उत्तर है कि रिश्ते जिस नाम से पुकारे जाते वे तो इंसान को बहुत प्यारे लगते हैं , परन्तु उन रिश्तों के जो मूल भूत तत्व होते हैं वे सार्वजनिक तौर पर समाज मे चर्चा का विषय नही होते । बल्कि ज्यादातर लोग अकेले मे भी उन मूलभूत तत्वों को संज्ञारूप मे नहीं पुकारते , हां जब गाली देना हो तो भले ही कहें - तेरी ....... , वगैरह ।
वेज गालियों मे जहां पर किसी की व्यक्तिगत कमजोरी को सार्वजनिक करके उसे नीचा दिखाने की कोशिश होती है वहीं नॉन वेज गालियों व्यक्ति के महत्वपूर्ण रिश्तों से बिना जिम्मेदारी उठाये उनका आनन्द लेने की चेष्ठा की जाती है । इसकी थोड़ी सी व्याख्या की जाय तो अर्थ यह हुआ कि पिता को जो आनन्द एक पिता की जिम्मेदारी उठाने का कर्तव्य निभाने पर प्राप्त है वह जब कोई बिना जिम्मेदारी के प्राप्त करने का दावा करता है तो वह मां की गाली बन जाती है । यही प्रक्रिया अन्य रिश्तों के साथ भी है ।
गालियों का इतिहास बहुत पुराना है , इनका जिक्र रामायण और महाभारत मे भी आता है । याद कीजिए वह प्रसंग जब भरत और शत्रुघ्न ननिहाल से लौट कर आते हैं और राम , सीता व लक्ष्मण के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार उन्हे पता चलता है तो भरत द्वारा माता कैकेयी के प्रति कुछ अपशब्दों का जिक्र है जिन्हे गाली की श्रेणी मे कहा जा सकता है , भरत द्वारा माता कैकेयी के प्रति इन शब्दों को गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस चौपायी के रूप मे दिया है :
"बर मांगत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुह परेउ न कीरा ॥"
इसी तरह मंत्री सुमंत जब गंगा तट पर वनवास गमन के समय पिता राजा दशरथ का संदेश सुनाते हैं , उस समय लक्ष्मण के द्वारा कुछ शब्दों का भी जिक्र है जो शायद अपशब्द ही हो सकते हैं , परन्तु उन्हे गोस्वामी जी ने मर्यादा के अनुरूप न पा कर कुछ इस तरह लिखा है :
पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन संदेसु कहिय जनि जाई ॥
कुछ और भी प्रसंग हैं रामायण मे जहां इस तरह के असंसदीय भाषा का अंदेशा होता है लेकिन अपशब्दों और गालियों का सबसे रोचक प्रसंग तो महाभारत मे है जहां श्री कृष्ण ने शिशुपाल को गालियां देने की एक लिमिट दे दी । यानी शिशुपाल को पूरी छूट थी कि वह १०० गालियां दे सकता था , जैसे ही उसने यह लिमिट पार किया , श्री कृष्ण ने उसका सिर सुदर्शन चक्र से काट दिया । इससे यह भी साबित होता है कि गालियां सहने की भी एक सीमा होती है , उसके बाद इसका परिणाम भयंकर हो सकता है ।
इन सब के बीच मे मुझे लगता है कि गालियों से जुड़ी एक सबसे रोचक परम्परा के जिक्र किये बिना यह पूरी चर्चा अधूरी रह जायेगी , वह है उत्तर भारत खास कर अवधी और भोजपुरी भाषी क्षेत्र मे ससुराल मे दूल्हे और उसके सगों के स्वागत में गायी जाने वाली गालियों के गीत । जो लोग इस परम्परा से सम्बद्ध हैं , इस बात की याद आते ही उनके चेहरे पर मुस्कान जरूर आ गयी होगी । जब कोई बारात आती है या शादी के बाद दूल्हा या दूल्हे के सगे ससुराल जाते हैं , तो उनके भोजन के समय जब वे खाना खाने बैठते हैं , उस समय व्यंजनो की थाली तो उनके सामने सजा कर परोसी ही जाती है साथ ही साथ , महिला मंडली द्वारा , नेपथ्य से गाली भरे गीत ढोलक की मधुर थाप के साथ गाये जाते हैं । यह एक शगुन जैसा होता है । लोग खूब मजे लेकर इसका आनंद उठाते हैं , खास-खास लोगों के नाम लिख कर , गाने वाली महिला मंडली के पास पंहुचाये जाते हैं , ताकि किसी का नाम छूट न जाय और वह बाद मे इस बात को लेकर बुरा न मान जाय या नाराज न हो जाय । इस तरह हर खास खास को नाम से और बाकी सबको आम तौर पर गाली मिलती है । बिल्कुल रामलीला के मंच से होने वाली उद्दघोषणाओं की तरह । मेरी जानकारी मे कुछ ऐसे किस्से भी हैं जब खाने के समय गाली वाले गीत न सुनाई पड़ने पर लोगों ने खाना खाने से मना कर दिया और खाना तभी खाया जब गालियां गाने वाली महिला मंडली आ गयी और गाना शुरू कर दिया ।
गाली पुराण के महाग्रंथ मे गाली देने वाले बड़े बड़े महारथी हैं । समाज का कोई क्षेत्र नही बचा है , सबके अपने अपने तरीके हैं कोई खुलकर गाली देता है कोई परिमार्जित शब्दों मे गाली देता है , मैं तो यहां तक कहूंगा कि इनके बिना समाज अधूरा है । गाली देने से आपकी भड़ास निकल जाती है , चित्त को शांति मिलती है , गाली देने वाले का स्ट्रेस रिलीज होता है । ये सबसे बड़ी स्ट्रेस बस्टर हैं । इनकी वजह से सुनने वाले को परेशानी हो सकती है परन्तुं इन्हे देने वाला सही इस्तेमाल करे तो हर तनाव से मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करता है । गालियों मे मंत्रों जैसी शक्ति है , आत्मानंदित करने की और विनाश करने की भी। सब कुछ बस इनके उपयोग के तरीके पर निर्भर है ।
गालियां मोटे तौर पर दो तरह की होती हैं , आम बोल चाल की भाषा मे हम एक को वेज ( श्लील ) और दूसरे को नॉन वेज ( अश्लील ) कहते है । वेज गालियों की श्रेणी मे वे गालियां आती जो आम तौर पर रिश्तों पर केंद्रित न होकर गुणों पर ज्यादा केंद्रित होती हैं जैसे किसी को कम-अक्ल बताने के लिए गधा या उल्लू कहा जाता है या किसी को तुच्छ या अति चापलूस बताने के लिए कुत्ता कहा जाता है । कुछ कम स्तर की गालियां ( वैसे कुछ लोग इन्हे गाली नही मानते ) भी हैं जैसे जब कोई छात्र बिना अर्थ समझे और आत्मसात किये अपने पाठ का रट्टा लगाता है तो उसे तोता - रटन्त से सम्बोधित करते हैं । नॉन वेज गालियां रिश्तों और रिश्तेदारियों पर केंद्रित होती हैं । ये उन रिश्तों के मूलभूत तत्व को सरेआम उजागर करके आपको अपमान सहने वाली अवस्था मे ला खड़ा करती हैं । वैसे देखा जाय तो रिश्ते इंसान को इंसान बनाते हैं परन्तु उन्ही रिश्तों का जिक्र गालियों के रूप मे , उसे हैवान बना देता है । ऐसा क्यों होता है ? इसका सीधा सपाट उत्तर है कि रिश्ते जिस नाम से पुकारे जाते वे तो इंसान को बहुत प्यारे लगते हैं , परन्तु उन रिश्तों के जो मूल भूत तत्व होते हैं वे सार्वजनिक तौर पर समाज मे चर्चा का विषय नही होते । बल्कि ज्यादातर लोग अकेले मे भी उन मूलभूत तत्वों को संज्ञारूप मे नहीं पुकारते , हां जब गाली देना हो तो भले ही कहें - तेरी ....... , वगैरह ।
वेज गालियों मे जहां पर किसी की व्यक्तिगत कमजोरी को सार्वजनिक करके उसे नीचा दिखाने की कोशिश होती है वहीं नॉन वेज गालियों व्यक्ति के महत्वपूर्ण रिश्तों से बिना जिम्मेदारी उठाये उनका आनन्द लेने की चेष्ठा की जाती है । इसकी थोड़ी सी व्याख्या की जाय तो अर्थ यह हुआ कि पिता को जो आनन्द एक पिता की जिम्मेदारी उठाने का कर्तव्य निभाने पर प्राप्त है वह जब कोई बिना जिम्मेदारी के प्राप्त करने का दावा करता है तो वह मां की गाली बन जाती है । यही प्रक्रिया अन्य रिश्तों के साथ भी है ।
गालियों का इतिहास बहुत पुराना है , इनका जिक्र रामायण और महाभारत मे भी आता है । याद कीजिए वह प्रसंग जब भरत और शत्रुघ्न ननिहाल से लौट कर आते हैं और राम , सीता व लक्ष्मण के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार उन्हे पता चलता है तो भरत द्वारा माता कैकेयी के प्रति कुछ अपशब्दों का जिक्र है जिन्हे गाली की श्रेणी मे कहा जा सकता है , भरत द्वारा माता कैकेयी के प्रति इन शब्दों को गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस चौपायी के रूप मे दिया है :
"बर मांगत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुह परेउ न कीरा ॥"
इसी तरह मंत्री सुमंत जब गंगा तट पर वनवास गमन के समय पिता राजा दशरथ का संदेश सुनाते हैं , उस समय लक्ष्मण के द्वारा कुछ शब्दों का भी जिक्र है जो शायद अपशब्द ही हो सकते हैं , परन्तु उन्हे गोस्वामी जी ने मर्यादा के अनुरूप न पा कर कुछ इस तरह लिखा है :
पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन संदेसु कहिय जनि जाई ॥
कुछ और भी प्रसंग हैं रामायण मे जहां इस तरह के असंसदीय भाषा का अंदेशा होता है लेकिन अपशब्दों और गालियों का सबसे रोचक प्रसंग तो महाभारत मे है जहां श्री कृष्ण ने शिशुपाल को गालियां देने की एक लिमिट दे दी । यानी शिशुपाल को पूरी छूट थी कि वह १०० गालियां दे सकता था , जैसे ही उसने यह लिमिट पार किया , श्री कृष्ण ने उसका सिर सुदर्शन चक्र से काट दिया । इससे यह भी साबित होता है कि गालियां सहने की भी एक सीमा होती है , उसके बाद इसका परिणाम भयंकर हो सकता है ।
इन सब के बीच मे मुझे लगता है कि गालियों से जुड़ी एक सबसे रोचक परम्परा के जिक्र किये बिना यह पूरी चर्चा अधूरी रह जायेगी , वह है उत्तर भारत खास कर अवधी और भोजपुरी भाषी क्षेत्र मे ससुराल मे दूल्हे और उसके सगों के स्वागत में गायी जाने वाली गालियों के गीत । जो लोग इस परम्परा से सम्बद्ध हैं , इस बात की याद आते ही उनके चेहरे पर मुस्कान जरूर आ गयी होगी । जब कोई बारात आती है या शादी के बाद दूल्हा या दूल्हे के सगे ससुराल जाते हैं , तो उनके भोजन के समय जब वे खाना खाने बैठते हैं , उस समय व्यंजनो की थाली तो उनके सामने सजा कर परोसी ही जाती है साथ ही साथ , महिला मंडली द्वारा , नेपथ्य से गाली भरे गीत ढोलक की मधुर थाप के साथ गाये जाते हैं । यह एक शगुन जैसा होता है । लोग खूब मजे लेकर इसका आनंद उठाते हैं , खास-खास लोगों के नाम लिख कर , गाने वाली महिला मंडली के पास पंहुचाये जाते हैं , ताकि किसी का नाम छूट न जाय और वह बाद मे इस बात को लेकर बुरा न मान जाय या नाराज न हो जाय । इस तरह हर खास खास को नाम से और बाकी सबको आम तौर पर गाली मिलती है । बिल्कुल रामलीला के मंच से होने वाली उद्दघोषणाओं की तरह । मेरी जानकारी मे कुछ ऐसे किस्से भी हैं जब खाने के समय गाली वाले गीत न सुनाई पड़ने पर लोगों ने खाना खाने से मना कर दिया और खाना तभी खाया जब गालियां गाने वाली महिला मंडली आ गयी और गाना शुरू कर दिया ।
गाली पुराण के महाग्रंथ मे गाली देने वाले बड़े बड़े महारथी हैं । समाज का कोई क्षेत्र नही बचा है , सबके अपने अपने तरीके हैं कोई खुलकर गाली देता है कोई परिमार्जित शब्दों मे गाली देता है , मैं तो यहां तक कहूंगा कि इनके बिना समाज अधूरा है । गाली देने से आपकी भड़ास निकल जाती है , चित्त को शांति मिलती है , गाली देने वाले का स्ट्रेस रिलीज होता है । ये सबसे बड़ी स्ट्रेस बस्टर हैं । इनकी वजह से सुनने वाले को परेशानी हो सकती है परन्तुं इन्हे देने वाला सही इस्तेमाल करे तो हर तनाव से मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करता है । गालियों मे मंत्रों जैसी शक्ति है , आत्मानंदित करने की और विनाश करने की भी। सब कुछ बस इनके उपयोग के तरीके पर निर्भर है ।
रविवार, 25 अप्रैल 2010
सरकार की चाल - हर दिन नये कमाल
आजकल हिंदी ब्लॉग जगत मे एक ही मुद्दा सबको उद्वेलित करता है वह है धर्म की बुराई , इसके लिए बहुत से लोग दूसरे के धर्म मे क्या क्या बुराइयां है उसके विशेषज्ञ बन जायेंगे । लेकिन जो मुख्य बात है , एक जिम्मेदार समाज, जिम्मेदार सरकार और जिम्मेदार मीडिया बनाया जाय उस पर बहस हो क्योंकि वही मिल कर इस देश को सही दिशा देगें जो इसे २०२० तक महाशक्ति बनाएगा , उस पर से नज़र नही रखी जा रही है ।
मरे विचार मे आईपीएल का भ्रष्टाचार इस सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक भ्रष्टाचार बन कर उभर रहा है जिसमें कई केंद्रीय मंत्री और सांसद सीधे रूप से जुड़े दिखाए पड़ रहे हैं । इसके साथ दूसरा पहलू यह है कि आम जनता मे इसकी लोकप्रियता कम होती नहीं नज़र आ रही है । तो क्या सोचा जाय , यह कैसी भावना है , यह कैसा दृष्टिकोण है । इसी पर चर्चा मे मेरे एक मित्र ने कहा कि देश की जनता को छोड़ दीजिए , ’ कुछ दिनों पहले तक हर बम विस्फोट के बाद इसी व्यवहार को स्पीरिट ओफ़ मुम्बई / इन्डिया ’ के नाम से ग्लोरीफाई किया जा रहा था । बाद मे समझ मे आया कि या तो यह मज़बूरी है या बेपरवाही ( जैसे सड़क पर एक्सीडेंट देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं और अगर अपने किसी के साथ ऐसा हो जाय तब लगता है कि लोगों मे इंसानियत मर गयी है ) । यानी जब तक अपने किसी को चोट न लगी हो बेपरवाह रहो । इसलिए आज जब मैच देखने वालों मे कोई कमी नहीं हो रही चाहे टीवी पर हो या स्टेडियम में तो यह कोई अजीब बात नही है इस तरह के व्यवहार को स्वाभाविक ही मानकर चला जाना चाहिए । वैसे भी हमारे देश मे घूस लेने वाले का कभी सामाजिक बहिष्कार नही हुआ ।
सरकार जिस तरह आईपीएल की जांच कर रही है , खबरें लीक कर रही है ऐसा लगता है कि कुछ और ही स्कोर सेटेल किया जा रहा है । २००९ चुनावों मे जीत के बाद कांग्रेस ने यह कोशिश किया कि नये , युवा , प्रोफेसनल और इमानदार छबि वाले चेहरे सामने लाये गये जो आगे चल कर राहुल गांधी की भविष्य की टीम के कर्णधार बनेगें , उनमे से थरूर बहुत ही अहम थे । लेकिन जिस तरह आर्थिक भ्रष्टाचार के शक मे उनको हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा , खासकर ऐसा लगता है कि ललित मोदी ने यह सब एन सी पी ( शरद पवार ) के संरक्षण से किया , इसलिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आहत है और अब चौतरफा तीर चलाए जा रहे हैं ।
एक और बात , राजनीति के चलने मे काले धन की भी बहुत भूमिका होती है । अपने विरोधी ( या सहयोगी भी ) को नियन्त्रित करने के लिए उसके इस सोर्स को सुखाने की भी कोशिश हो सकती है । जहां तक जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो ने बात कही जा रही है तो एक ही जवाब - " हा हा हा " । हम सब यह तमाशा अनेकों बार देख चुके हैं । बोफोर्स जांच , यूटीआई घोटाले की जांच , वोट फॉर नोट पर जांच , तेलगी पर जांच जैसे बहुत से उदाहरण हैं । अगर राजनीतिज्ञ शामिल होंगे तो कुछ नही मिलेगा । हां अगर केवल उद्योगपति शामिल हो तो कुछ आशा है जैसे सत्यम केस मे कुछ सत्य बाहर आया मगर वह भी पूरा नहीं था ।
ललित मोदी के आईपीएल से हटते ही , शशि थरूर के बदले एक-एक का स्कोर बराबर हो जायेगा , पवार और कांग्रेस मिल कर महाराष्ट्र और दिल्ली मे सरकार चलाएंगे , जांच तो चलती रहेगी । दूसरा नया मुद्दा मिल जायेगा या यूं कहे मिल ही गया है " टेलीफोन टेपिंग का " , सारे बिजी रहेगें , हम आप और संसद भी ।
आखिर मे संसद के सत्र के आस पास ही क्यों इस तरह की बातें निकलती हैं , यह जानबूझ कर मुख्य और जनता से जुड़े मुद्दों से बहस को भटका कर , संसद को हंगामे की भेंट चढ़ाने की चाल तो नहीं । अब कहां है महंगाई पर बहस , कहां है न्युक्लियर लायबिलिटी पर बहस और कहां है महिला आरक्षण पर बहस । सब बातें नेपथ्य मे चली गयीं । भाजपा की रैली और अन्य विपक्ष की रैली के बाद महगांई हर समाचार माध्यम पर बहस का मुख्य मुद्दा होना चाहिए था लेकिन देखिए जिस दिन भाजपा की रैली थी सारे चैनेल आईपीएल , ललित मोदी , शशि थरूर और सुनन्दा पुश्कर पर बहस कर रहे थे , हां थोड़ी बहुत चर्चा अगर थी तो लगने वाले जाम की या नितिन गड़करी के हीट स्ट्रोक से गिर जाने की । अब जिस दिन वाम पंथी व अन्य दल रैली करेंगे उसदिन टेलीफोन टेपिंग पर अख़बारों मे , संसद मे और टीवी पर बहस हो रही होगी , इसका पूरा इन्तजाम कर लिया गया है ।
टेलीफोन टेपिंग के रहस्य का खुलासा किसने किया - आउट लुक और विनोद मेहता ने । आज तक तो मुझे आउट लुक स्वतंत्र पत्रिका कम कांग्रेस संदेश ज्यादा और विनोद मेहता जी स्वतंत्र संपादक कम और कांग्रेस के प्रवक्ता ज्यादा नज़र आते थे । आज यह चमत्कार कैसे , क्या सचमुच ये सरकार की पोल खोल रहे हैं या उसके साथ मिल कर बड़ी बात को दबाने के लिए छोटा हंगामा खड़ा कर रहे हैं ।
मरे विचार मे आईपीएल का भ्रष्टाचार इस सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक भ्रष्टाचार बन कर उभर रहा है जिसमें कई केंद्रीय मंत्री और सांसद सीधे रूप से जुड़े दिखाए पड़ रहे हैं । इसके साथ दूसरा पहलू यह है कि आम जनता मे इसकी लोकप्रियता कम होती नहीं नज़र आ रही है । तो क्या सोचा जाय , यह कैसी भावना है , यह कैसा दृष्टिकोण है । इसी पर चर्चा मे मेरे एक मित्र ने कहा कि देश की जनता को छोड़ दीजिए , ’ कुछ दिनों पहले तक हर बम विस्फोट के बाद इसी व्यवहार को स्पीरिट ओफ़ मुम्बई / इन्डिया ’ के नाम से ग्लोरीफाई किया जा रहा था । बाद मे समझ मे आया कि या तो यह मज़बूरी है या बेपरवाही ( जैसे सड़क पर एक्सीडेंट देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं और अगर अपने किसी के साथ ऐसा हो जाय तब लगता है कि लोगों मे इंसानियत मर गयी है ) । यानी जब तक अपने किसी को चोट न लगी हो बेपरवाह रहो । इसलिए आज जब मैच देखने वालों मे कोई कमी नहीं हो रही चाहे टीवी पर हो या स्टेडियम में तो यह कोई अजीब बात नही है इस तरह के व्यवहार को स्वाभाविक ही मानकर चला जाना चाहिए । वैसे भी हमारे देश मे घूस लेने वाले का कभी सामाजिक बहिष्कार नही हुआ ।
सरकार जिस तरह आईपीएल की जांच कर रही है , खबरें लीक कर रही है ऐसा लगता है कि कुछ और ही स्कोर सेटेल किया जा रहा है । २००९ चुनावों मे जीत के बाद कांग्रेस ने यह कोशिश किया कि नये , युवा , प्रोफेसनल और इमानदार छबि वाले चेहरे सामने लाये गये जो आगे चल कर राहुल गांधी की भविष्य की टीम के कर्णधार बनेगें , उनमे से थरूर बहुत ही अहम थे । लेकिन जिस तरह आर्थिक भ्रष्टाचार के शक मे उनको हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा , खासकर ऐसा लगता है कि ललित मोदी ने यह सब एन सी पी ( शरद पवार ) के संरक्षण से किया , इसलिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आहत है और अब चौतरफा तीर चलाए जा रहे हैं ।
एक और बात , राजनीति के चलने मे काले धन की भी बहुत भूमिका होती है । अपने विरोधी ( या सहयोगी भी ) को नियन्त्रित करने के लिए उसके इस सोर्स को सुखाने की भी कोशिश हो सकती है । जहां तक जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो ने बात कही जा रही है तो एक ही जवाब - " हा हा हा " । हम सब यह तमाशा अनेकों बार देख चुके हैं । बोफोर्स जांच , यूटीआई घोटाले की जांच , वोट फॉर नोट पर जांच , तेलगी पर जांच जैसे बहुत से उदाहरण हैं । अगर राजनीतिज्ञ शामिल होंगे तो कुछ नही मिलेगा । हां अगर केवल उद्योगपति शामिल हो तो कुछ आशा है जैसे सत्यम केस मे कुछ सत्य बाहर आया मगर वह भी पूरा नहीं था ।
ललित मोदी के आईपीएल से हटते ही , शशि थरूर के बदले एक-एक का स्कोर बराबर हो जायेगा , पवार और कांग्रेस मिल कर महाराष्ट्र और दिल्ली मे सरकार चलाएंगे , जांच तो चलती रहेगी । दूसरा नया मुद्दा मिल जायेगा या यूं कहे मिल ही गया है " टेलीफोन टेपिंग का " , सारे बिजी रहेगें , हम आप और संसद भी ।
आखिर मे संसद के सत्र के आस पास ही क्यों इस तरह की बातें निकलती हैं , यह जानबूझ कर मुख्य और जनता से जुड़े मुद्दों से बहस को भटका कर , संसद को हंगामे की भेंट चढ़ाने की चाल तो नहीं । अब कहां है महंगाई पर बहस , कहां है न्युक्लियर लायबिलिटी पर बहस और कहां है महिला आरक्षण पर बहस । सब बातें नेपथ्य मे चली गयीं । भाजपा की रैली और अन्य विपक्ष की रैली के बाद महगांई हर समाचार माध्यम पर बहस का मुख्य मुद्दा होना चाहिए था लेकिन देखिए जिस दिन भाजपा की रैली थी सारे चैनेल आईपीएल , ललित मोदी , शशि थरूर और सुनन्दा पुश्कर पर बहस कर रहे थे , हां थोड़ी बहुत चर्चा अगर थी तो लगने वाले जाम की या नितिन गड़करी के हीट स्ट्रोक से गिर जाने की । अब जिस दिन वाम पंथी व अन्य दल रैली करेंगे उसदिन टेलीफोन टेपिंग पर अख़बारों मे , संसद मे और टीवी पर बहस हो रही होगी , इसका पूरा इन्तजाम कर लिया गया है ।
टेलीफोन टेपिंग के रहस्य का खुलासा किसने किया - आउट लुक और विनोद मेहता ने । आज तक तो मुझे आउट लुक स्वतंत्र पत्रिका कम कांग्रेस संदेश ज्यादा और विनोद मेहता जी स्वतंत्र संपादक कम और कांग्रेस के प्रवक्ता ज्यादा नज़र आते थे । आज यह चमत्कार कैसे , क्या सचमुच ये सरकार की पोल खोल रहे हैं या उसके साथ मिल कर बड़ी बात को दबाने के लिए छोटा हंगामा खड़ा कर रहे हैं ।
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
शाहरुख खान भी आईपीएल की जांच के घेरे में ??
एक छोटी सी ट्वीट आज देश की सबसे बड़ी समस्या बन गयी या जान बूझ कर बनायी जा रही है । जो बात सबसे अचंभित कर रही है कि न मंहगाई , न नक्सल समस्या , न बिजली की कमी और न शिक्षा , स्वास्थ्य जैसी समस्यायें , कोई भी बात आज महत्वपूर्ण नही रह गयी है । आज केवल आईपीएल चर्चा मे है वह भी अनुचित कारणों से । क्या और मंत्रियों की बलि लेगा यह विवाद , जैसा कि नजर आ रहा है थरूर साहब तो गये ही अब प्रफुल्ल पटेल , उनकी बेटी और शरद पवार की बेटी व सांसद सुप्रिया सुले पर आरोप लग रहे हैं । इसके साथ सुपर स्टार शाहरुख खान को भी नोटिस दिया गया है । यह गंभीर मामला है क्योंकि शाहरुख खान कांग्रेस के करीबी माने जाते हैं । आखिर अभी कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी उनकी फिल्म को प्रदर्शित होने देने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दे चुके हैं । ऐसे मे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कोई बचा है या यह तमाशा सचमुच काला अध्याय बनेगा और कई नामचीन लोगों को अपने घेरे मे लेगा ।
तरह तरह की जांच की बात की जा रही है जिनमे से एक मांग संयुक्त संसदीय समिति ( जेपीसी ) की भी हो रही है । यह मांग एक नयी चाल भी हो सकती है क्योंकि जेपीसी के सदस्यों मे दलों को प्रतिनिधित्व उनके संसद मे उनके संख्या बल के आधार पर जगह दी जाती है । ऐसे मे शासन करने वाले मोर्चे का बहुमत वहां रहेगा और परिणाम भी काफी हद तक उनके मुताबिक ही आना निश्चित है । पिछली कुछ जेपीसी की जांच का तो यही हश्र हुआ है । चाहे बोफोर्स के समय हो या अभी २००८ मे नोट फॉर वोट वाले मामले पर हो । वैसे यह भी सवाल उठता है कि जब राजनैतिक लोग शक के घेरे मे हैं तो वे क्यों स्वयं इसकी जांच कर रहे हैं आखिर उच्चतम न्यायालय के तीन जजों की समिति क्यों न बनाई जाय और उसे उच्चतम न्यायालय के सारे अधिकार प्राप्त हों जिससे वह जिसे चाहे बुला सके और जो रिकार्ड चाहे मंगा सके , चाहे देश से या विदेश से ।
मामला इतना गंभीर है कि प्रधानमंत्री वित्त मंत्री और गृह मंत्री के अलावा कई बार राजीव शुक्ला से चर्चा कर चुके हैं और आज सोनिया गांधी से भी मंत्रणा कर चुके हैं । इस हालत पर मुझे याद आता है , डॉ धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक ’ अन्धा युग ’ जिसके स्थापना भाग मे विष्णु पुराण को उद्दॄत करते हुए लिखा है :
’ततश्चानुदिनमल्पाल्प ह्रास
व्यवच्छेददाद्धर्मार्थह्योर्जगतस्संक्षयो भविष्यति ।’
उस भविष्य में
धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होगें
क्षय होगा धीरे -धीरे सारी धरती का ।
’ततश्चार्थ एवाभिजन हेतु ।’
सत्ता होगी उनकी
जिनकी पूंजी होगी ।
’कपटवेष धारणमेव महत्व हेतु ।’
जिनके नकली चेहरे होंगे
केवल उन्हे महत्व मिलेगा ।
’एवम चाति लुब्धक राजा
सहाश्शैलानामन्तरद्रोणी: प्रजा संश्रियष्यन्ति ।’
राजशक्तियां लोलुप होगीं ;
जनता उनसे पीडित होकर
गहन गुफाओं मे छिपकर दिन काटेगी ।
( गहन गुफाएं ! वे सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की )
मतलब यह कि महंगाई चरम पर है , देश की बड़ा हिस्सा नक्सलवादी माओ वादी हिंसा से ग्रस्त है और देश का शासक वर्ग , अन्य उच्च वर्ग ( एलीट क्लास ) के साथ मिलकर काले पैसे से सबसे लोकप्रिय खेल का तमाशा खड़ा करके जनता को लूटने मे लगा है । इस सब को टैक्स मे छूट भी दिया जा रहा है । आखिर जनता क्या करे कहां जाय ।
जब से यह पढ़ा कि शाहरुख खान ने भी मॉरिसस मे रजिस्टर्ड कम्पनियो द्वारा पैसा लगाया है , थोड़ा धक्का लगा क्योंकि शाहरुख सबसे अधिक और उचित टैक्स देने वालों मे शुमार होते हैं । ईश्वर करे कुछ आदर्श तो बचे रहें , उनके विरुद्ध कुछ न मिले ।
तरह तरह की जांच की बात की जा रही है जिनमे से एक मांग संयुक्त संसदीय समिति ( जेपीसी ) की भी हो रही है । यह मांग एक नयी चाल भी हो सकती है क्योंकि जेपीसी के सदस्यों मे दलों को प्रतिनिधित्व उनके संसद मे उनके संख्या बल के आधार पर जगह दी जाती है । ऐसे मे शासन करने वाले मोर्चे का बहुमत वहां रहेगा और परिणाम भी काफी हद तक उनके मुताबिक ही आना निश्चित है । पिछली कुछ जेपीसी की जांच का तो यही हश्र हुआ है । चाहे बोफोर्स के समय हो या अभी २००८ मे नोट फॉर वोट वाले मामले पर हो । वैसे यह भी सवाल उठता है कि जब राजनैतिक लोग शक के घेरे मे हैं तो वे क्यों स्वयं इसकी जांच कर रहे हैं आखिर उच्चतम न्यायालय के तीन जजों की समिति क्यों न बनाई जाय और उसे उच्चतम न्यायालय के सारे अधिकार प्राप्त हों जिससे वह जिसे चाहे बुला सके और जो रिकार्ड चाहे मंगा सके , चाहे देश से या विदेश से ।
मामला इतना गंभीर है कि प्रधानमंत्री वित्त मंत्री और गृह मंत्री के अलावा कई बार राजीव शुक्ला से चर्चा कर चुके हैं और आज सोनिया गांधी से भी मंत्रणा कर चुके हैं । इस हालत पर मुझे याद आता है , डॉ धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक ’ अन्धा युग ’ जिसके स्थापना भाग मे विष्णु पुराण को उद्दॄत करते हुए लिखा है :
’ततश्चानुदिनमल्पाल्प ह्रास
व्यवच्छेददाद्धर्मार्थह्योर्जगतस्संक्षयो भविष्यति ।’
उस भविष्य में
धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होगें
क्षय होगा धीरे -धीरे सारी धरती का ।
’ततश्चार्थ एवाभिजन हेतु ।’
सत्ता होगी उनकी
जिनकी पूंजी होगी ।
’कपटवेष धारणमेव महत्व हेतु ।’
जिनके नकली चेहरे होंगे
केवल उन्हे महत्व मिलेगा ।
’एवम चाति लुब्धक राजा
सहाश्शैलानामन्तरद्रोणी: प्रजा संश्रियष्यन्ति ।’
राजशक्तियां लोलुप होगीं ;
जनता उनसे पीडित होकर
गहन गुफाओं मे छिपकर दिन काटेगी ।
( गहन गुफाएं ! वे सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की )
मतलब यह कि महंगाई चरम पर है , देश की बड़ा हिस्सा नक्सलवादी माओ वादी हिंसा से ग्रस्त है और देश का शासक वर्ग , अन्य उच्च वर्ग ( एलीट क्लास ) के साथ मिलकर काले पैसे से सबसे लोकप्रिय खेल का तमाशा खड़ा करके जनता को लूटने मे लगा है । इस सब को टैक्स मे छूट भी दिया जा रहा है । आखिर जनता क्या करे कहां जाय ।
जब से यह पढ़ा कि शाहरुख खान ने भी मॉरिसस मे रजिस्टर्ड कम्पनियो द्वारा पैसा लगाया है , थोड़ा धक्का लगा क्योंकि शाहरुख सबसे अधिक और उचित टैक्स देने वालों मे शुमार होते हैं । ईश्वर करे कुछ आदर्श तो बचे रहें , उनके विरुद्ध कुछ न मिले ।
रविवार, 18 अप्रैल 2010
आईपीएल , शशि थरूर और फ़िराक गोरखपुरी की कथा
आज सबसे ज्यादा चर्चा खबरिया चैनेलों पर आईपीएल की हो रही है , दांतेवाड़ा पर कम और सुनन्दा पुश्कर पर ज्यादा समय लगा रहा है मीडिया । इस बीच थरूर साहेब सफाई दे रहे हैं कभी चैनेलों पर , कभी संसद को , कभी वित्त मंत्री को , कभी कांग्रेस अध्यक्ष को और अब प्रधान मंत्री को । बेचारे समझ नही पा रहे है कि उन्होने क्या गलती कर दी । इतने सुलझे हुए अधिकारी थे , यूएनओ मे पूरा कैरियर बिता कर आये , सारे विश्व के मीडिया की समझ रखते हैं , भाग्य साथ होता तो यूएन के सेक्रेटरी जनरल होते और पूरी दुनिया के मीडिया को संभाल रहे होते । लेकिन बेचारे जबसे मंत्री बने हैं एक कंट्रोवर्सी से दूसरी कंट्रोवर्सी मे फंसते और बचते समय बिता रहे हैं ।
थरूर साहेब बार बार कह रहे हैं कि सुनन्दा मेरी मित्र तो हैं मगर कोई रिश्ता नही है मतलब पत्नी नहीं हैं । वे बार बार समझा रहे हैं कि वे विदेश राज्य मंत्री हैं और आईपीएल उनके मंत्रालय का मामला नहीं है, लेकिन मीडिया के मित्रगण यह सब मानने और समझने को तैयार नही हैं । उनकी समझ मे यह भी नही आ रहा कि सुनन्दा को लाभ मिलने मे क्या गलत बात है ? आखिर पत्नी को लाभ दिलवाते तो गलत हो सकता था लेकिन महिला मित्र को लाभ कानूनी नज़र से घूस तो नहीं कहा जा सकता । अब नैतिकता का मुद्दा मत उठाइये वह तो केवल विरोधियों के लिए होता है ।
इस बात पर मुझे , बचपन मे हिंदी की मशहूर पत्रिका धर्मयुग मे फ़िराक गोरखपुरी साहेब के बारे मे छपा एक किस्सा जो उनके भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के अवसर का है वह स्मरण हो आया । उन्होने उस समय मंच से एक किस्सा सुनाया था जो कुछ इस तरह है :
एक बार एक नगर मे कुछ लोगों ने यह विचार किया कि अपने शहर की विधवा महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ करना चाहिए । लोगों ने तुरन्त एक विधवा कल्याण नाम से संस्था बना दी और नगर के एक बड़े समाजसेवक को इसका प्रधान नियुक्त कर दिया । उत्साही लोगों ने मिलकर घर घर जा कर इस संस्था के लिए चंदा भी इकट्टा किया । काफी धन इकट्ठा हो जाने के बाद लोगों ने सब कुछ प्रधान जी को सुपुर्द कर दिया । बहुत समय बीत गया तो लोगों को ध्यान आया कि प्रधान जी से जा कर मिला जाय और पता किया जाय कि विधवा कल्याण पर उन्होने क्या कदम उठाये हैं और भविष्य के लिए उनकी क्या योजना है । कई लोग प्रधान जी से मिलने उनके घर गये और शिकायत किया कि धन का क्या हुआ और वे उसे कैसे खर्च कर रहे हैं ?
प्रधान जी ने जवाब दिया - मित्रों , धन पूरी तरह सुरक्षित है और बैंक मे वैसा ही पड़ा है आप लोग बिल्कुल चिन्तित न होवें इसका सदुपयोग भी विधवा कल्याण के लिए ही होगा ’आखिर जब मैं मरूंगा तो मेरी पत्नी विधवा होगी कि नही’ ।
तो साहब थरूर हों , ललित मोदी हों या कोई और हो , खेल मे क्या रुचि ले रहा है और खेल का कितना कल्याण कर रहा है उसका तो पता नहीं लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने रिश्तेदारों और बेनामी तरीके से अपना कल्याण कर रहा है इसमे कोई दो राय नहीं है ।
सबसे बड़ी बात - इस तमाशे को टैक्स मे छूट दिया जा रहा है । यानी लूट चौतरफा ।
थरूर साहेब बार बार कह रहे हैं कि सुनन्दा मेरी मित्र तो हैं मगर कोई रिश्ता नही है मतलब पत्नी नहीं हैं । वे बार बार समझा रहे हैं कि वे विदेश राज्य मंत्री हैं और आईपीएल उनके मंत्रालय का मामला नहीं है, लेकिन मीडिया के मित्रगण यह सब मानने और समझने को तैयार नही हैं । उनकी समझ मे यह भी नही आ रहा कि सुनन्दा को लाभ मिलने मे क्या गलत बात है ? आखिर पत्नी को लाभ दिलवाते तो गलत हो सकता था लेकिन महिला मित्र को लाभ कानूनी नज़र से घूस तो नहीं कहा जा सकता । अब नैतिकता का मुद्दा मत उठाइये वह तो केवल विरोधियों के लिए होता है ।
इस बात पर मुझे , बचपन मे हिंदी की मशहूर पत्रिका धर्मयुग मे फ़िराक गोरखपुरी साहेब के बारे मे छपा एक किस्सा जो उनके भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के अवसर का है वह स्मरण हो आया । उन्होने उस समय मंच से एक किस्सा सुनाया था जो कुछ इस तरह है :
एक बार एक नगर मे कुछ लोगों ने यह विचार किया कि अपने शहर की विधवा महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ करना चाहिए । लोगों ने तुरन्त एक विधवा कल्याण नाम से संस्था बना दी और नगर के एक बड़े समाजसेवक को इसका प्रधान नियुक्त कर दिया । उत्साही लोगों ने मिलकर घर घर जा कर इस संस्था के लिए चंदा भी इकट्टा किया । काफी धन इकट्ठा हो जाने के बाद लोगों ने सब कुछ प्रधान जी को सुपुर्द कर दिया । बहुत समय बीत गया तो लोगों को ध्यान आया कि प्रधान जी से जा कर मिला जाय और पता किया जाय कि विधवा कल्याण पर उन्होने क्या कदम उठाये हैं और भविष्य के लिए उनकी क्या योजना है । कई लोग प्रधान जी से मिलने उनके घर गये और शिकायत किया कि धन का क्या हुआ और वे उसे कैसे खर्च कर रहे हैं ?
प्रधान जी ने जवाब दिया - मित्रों , धन पूरी तरह सुरक्षित है और बैंक मे वैसा ही पड़ा है आप लोग बिल्कुल चिन्तित न होवें इसका सदुपयोग भी विधवा कल्याण के लिए ही होगा ’आखिर जब मैं मरूंगा तो मेरी पत्नी विधवा होगी कि नही’ ।
तो साहब थरूर हों , ललित मोदी हों या कोई और हो , खेल मे क्या रुचि ले रहा है और खेल का कितना कल्याण कर रहा है उसका तो पता नहीं लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने रिश्तेदारों और बेनामी तरीके से अपना कल्याण कर रहा है इसमे कोई दो राय नहीं है ।
सबसे बड़ी बात - इस तमाशे को टैक्स मे छूट दिया जा रहा है । यानी लूट चौतरफा ।
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