तुझे यदि मन्ज़िलों का ज़रा भी ग़ुमान होता,
इन रास्तों से चलते हुए न यूं हैरान होता,
बिना हैरानियों के सफ़र न यूं जीवन्त होता,
शोरगुल के बीच भी मन तेरा वीरान होता ।
सामने नज़रों के तेरी गुजरते जो दॄश्य हैं,
बदलते यूं कि जैसे अभिसारिका के परिधान हैं,
ये कभी भी बोध स्थिरता का न होने देते हैं,
लग रहे ये चलते से, पर असल में तो तू गतिमान है।
यहां से पहले भी गुजरे हैं अनगिनत राही,
बाद में भी गुजरने वालों की कमी न होगी,
कुछ थे भूले कुछ थे भटके कुछ ने यह राह खोजी,
मत भटकना इस नैनाभिराम दॄश्य से तू मनोयोगी ।
तुझको मिलेगें कितने खण्डहर कितने जंगल कितने वीराने,
कितने साथी कितने प्रतिभागी कितने सीधे कितने सयाने,
वो जो हैं आज तेरे अपने जब मिले तब तो थे अनजाने,
इस पल में हैं साथ तेरे कल न थे कल होगें कोई न जाने ।
न रुकना कटंकाकीर्ण इस पथ मे देख तू पैरों के छाले,
दे सहारा उसको भी जो थका प्यासा घायल यदि कोई मिले,
चल पड़ेगा वो भी हारा पड़ा जो बस उसकी बांह गह ले,
तुझको भी तो साथी मिलेगा चल रहा था अब तक अकेले ।
तू है बटोही सिर्फ़ चलना ही तेरा कर्तव्य ठहरा,
न कर विश्राम न रुक कहीं भी और न ही तू कर बसेरा,
जो चुना पथ तूने अपना चलता रह बस उस पर निरन्तर,
ये निश्चित मान ले मिल जायेगा जो है गंतव्य तेरा ।
मनुष्य जीवन भर मंजिल की तलाश में भागता है और मंजिल उससे दूर होती जाती है, जैसे जल की तलाश में मृग मरू भूमि में मरीचिका का अनुभव करता है, संत कबीर के शब्दों में : पानी में है मीन पियासी
शनिवार, 12 सितंबर 2009
बुधवार, 9 सितंबर 2009
खोज
जीवन की इस आपा-धापी में,
एक अनजानी सफ़लता की खोज में,
निरन्तर भाग रहा है मनुष्य,
जैसे कोई मृग मरुभूमि में,
जिसे दिखता है जल, पर जो है नहीं,
वो भागता है उस ओर जी जान लगाकर,
जल है, उसे है पूर्ण विश्वास इस दृष्ट पर,
क्यों माने कि हैं ये सिर्फ़ लहरें प्रतीत रेत पर,
जब सब कुछ है उसे दृष्टि-गोचर,
जो सिर्फ़ श्रव्य नहीं दृष्टि-बंधन नहीं,
इस भ्रम जाल से मुक्ति का मार्ग कैसे मिले,
मृग हो या मनुष्य उचित राह पर कैसे चले,
ज्ञान, विश्वास, पुरुषार्थ कि प्राप्ति से पहले,
सफ़ल जीवन के लिये सन्मार्ग कैसे मिले,
जिस पर चल कर उसे गंतव्य मिले, इन्द्रजाल नहीं,
गुरु ही देगा वह ज्ञान का प्रकाश ,
गुरु-ज्ञान से ही विकसित होगा विश्वास,
उस विश्वास से ही विकसित होगा पुरुषार्थ,
उस पुरुषार्थ से ही मिलेगा वह सन्मार्ग,
जो जाता है जल की ओर मरीचिका कि ओर नहीं,
हे प्रभु इससे पहले कि कुछ और दे,
एक सद्गुरु से अवश्य मिलवा दे,
जिससे मिट जायेंगे सब भ्रम, कट जायेगें बंधन,
तब ही मिलेगा परमानंद, सफ़ल होगा यह जीवन,
गुरु की खोज से बढ़ कर कोई और खोज नहीं।
एक अनजानी सफ़लता की खोज में,
निरन्तर भाग रहा है मनुष्य,
जैसे कोई मृग मरुभूमि में,
जिसे दिखता है जल, पर जो है नहीं,
वो भागता है उस ओर जी जान लगाकर,
जल है, उसे है पूर्ण विश्वास इस दृष्ट पर,
क्यों माने कि हैं ये सिर्फ़ लहरें प्रतीत रेत पर,
जब सब कुछ है उसे दृष्टि-गोचर,
जो सिर्फ़ श्रव्य नहीं दृष्टि-बंधन नहीं,
इस भ्रम जाल से मुक्ति का मार्ग कैसे मिले,
मृग हो या मनुष्य उचित राह पर कैसे चले,
ज्ञान, विश्वास, पुरुषार्थ कि प्राप्ति से पहले,
सफ़ल जीवन के लिये सन्मार्ग कैसे मिले,
जिस पर चल कर उसे गंतव्य मिले, इन्द्रजाल नहीं,
गुरु ही देगा वह ज्ञान का प्रकाश ,
गुरु-ज्ञान से ही विकसित होगा विश्वास,
उस विश्वास से ही विकसित होगा पुरुषार्थ,
उस पुरुषार्थ से ही मिलेगा वह सन्मार्ग,
जो जाता है जल की ओर मरीचिका कि ओर नहीं,
हे प्रभु इससे पहले कि कुछ और दे,
एक सद्गुरु से अवश्य मिलवा दे,
जिससे मिट जायेंगे सब भ्रम, कट जायेगें बंधन,
तब ही मिलेगा परमानंद, सफ़ल होगा यह जीवन,
गुरु की खोज से बढ़ कर कोई और खोज नहीं।
शनिवार, 5 सितंबर 2009
अनायास मास्साब
आज शिक्षक दिवस पर मैं पूरी श्रद्धा से जीवन मे मिले समस्त शिक्षकों को ध्यान कर रहा हूं, जिन्होंने हमारे जीवन दिशा दी, हमें जीवन को जीने का सलीका सिखाया और दुनियां को समझने का दॄष्टिकोण दिया । इन्ही में एक थे श्री देवी प्रसाद सिंह, जिन्होने हमे हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ाया था । सिंह साहब सेना से रिटायर हो कर आये थे और अपने जीवन में सैनिक की भांति अनुशासन से रहते थे और सब से यही अपेक्षा भी करते थे । अपने अधिकार क्षेत्र में इसे पूरी शिद्दत से लागू करते थे । उनके इन गुणों को आज हम अच्छी तरह और समग्र भाव से आकलन कर सकते हैं परन्तु उस समय हम सब विद्यार्थी उन्हे ’अनायास मास्साब’ कहते थे । यह नाम उन्हें कैसे मिला, किसने दिया यह तो किसी को नहीं पता लेकिन क्यों पड़ा उसकी व्यथा कथा उनके इस नाम से ही ज़ाहिर है । असल में मास्साब अति अनुशासनप्रिय थे जबकि छात्रों को लगता था कि वह अनायास ही उन्हें दंडित करते रहते हैं ।
मास्साब का यह स्पष्ट मत था कि छात्रों को सुधारना बहुत ही आवश्यक है और सुधारने का एक ही तरीका है वह है डंडे का भरपूर इस्तेमाल । अपने इस विश्वास को वह पूरे मनोयोग से लागू करते थे । यह बात अपने ख़ास लहज़े मे बड़ी शान से हर मिलने वाले से बताते थे कि उनकी क्लास के सारे बच्चे हर टास्क ऐसी फ़ुर्ती से पूरा करते हैं जैसे "फिरकी" ज़रा सा हवा का सहारा पाते ही नाचती है । वैसे तो पूरे स्कूल का कोई बच्चा उनके सामने नहीं पड़ना चाहता था परंतु उनकी क्लास के बच्चों की तो मजबूरी थी । उनके सामने अगर अनुशासन टूटा तो तुरन्त सज़ा का फ़रमान मिल जाता था ।
उनका दंड विधान अलिखित होते हुए भी पूरा नियमबद्ध था । आप किसी भी परिस्थिति पर उनसे मुफ़्त क्लेरीफ़िकेसन ले सकते थे । यदि उन्होने एक बार सज़ा सुना दिया, चाहे उन्होने खुद अनुशासन हीनता देखी हो या किसी की शिकायत पर दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हो , आप नयी दलीलों के साथ उनसे दुबारा अपील कर सकते थे । लेकिन अगर ये दलीलें अपुष्ट और गलत हुईं तो सज़ा बढ़ जाती थी । अब इस अपील के बाद कोइ दूसरी अपील नहीं होती थी इस लिये सज़ा बढ़ने के डर से अपील का रिस्क कम ही लोग उठाते थे । यह कार्य एक न्यायाधीश की तरह वह पूरे निरपेक्ष भाव से करते थे।
सज़ा की मात्रा गलती के हिसाब से पूर्वनिर्धारित थी ,जिस प्रकार की और जितनी बड़ी गलती उसी हिसाब से उसकी सज़ा । जैसे क्लास के अंदर पढ़ाई हो रही हो और कोई खिड़की से बाहर झांक रहा है तो १/२ डंडा, यदि क्लास के बाहर मैदान में पढ़ा रहे हों और कोई सड़क की तरफ़ देख रहा हो तो १ डंडा, क्लास के बाहर इधर उधर घूम रहे हैं तो २ डंडे, होम वर्क करके नहीं लाये तो ३ डंडे, आपस में मार पीट कर रहे हो तो ४ या ५ डंडे। इसके अलावा पढ़ाई लिखाई में हुई अलग अलग गलतियों पर अलग अलग मात्रा निर्धारित थी । यह स्पष्ट कर दूं कि सज़ा १/४,१/२ और ३/४ डंडे भी होती थी । इसके लिए वे डंडे के उतने हिस्से पर पकड़ कर मारते थे, इससे उसकी चोट उसी मात्रा में कम लगती थी। यह उनकी अपनी खोज थी क्योंकि आज तक किसी और टीचर को एक डंडे से कम सज़ा देते मैनें नहीं देखा । बच्चे तो गलतियां दिन भर करते रहते थे और उनको दिन भर सज़ा भी सुनाई जाती रहती थी मगर सज़ा तुरंत नहीं मिलती थी । इसके लिए दो समय निर्धारित थे एक रेसिस से थोड़ा पहले और दूसरा दिन की छुट्टी से थोड़ा पहले । हर बच्चा अपनी दिन भर की सज़ाओं का लेखा रखता था, उपर्युक्त समय पर उनके पास जा कर हिसाब देता और सज़ा प्राप्त कर के खाता बन्द कराता। इसमें किसी तरह की गफ़लत करने पर सज़ा की मात्रा बढ़ जाती थी। यह एक तरह से टैक्स रिटर्न जैसा था कि आपको समय से भरना है नही तो पेनाल्टी पडेगी ।
उनका पढाई पर जितना ध्यान रहता उतना ही इस बात पर भी कि अगर जरा भी गलती हुई है तो सज़ा मिलना बहुत ज़रूरी है । इसे सुनिश्चित करने के लिए वह क्लास में दो या तीन मानीटर बनाते थे । यह नियुक्ति केवल एक दिन के लिये होती थी । उनकी नज़र में सारे छात्र एक समान थे इसलिए मानीटर के पद की नियुक्ति के लिये कोई विशेष गुण वाला छात्र नहीं खोजते थे यह मौका सब को मिलता था । दो या तीन मानीटर इस लिए कि उन्हें मास्साब के साथ पूरी क्लास पर नज़र रखना पड़ता था । किसी बच्चे का सिर ज़रा भी इधर उधर हुआ और उसके नाम का खाता खुला । प्रतिदिन मानीटर का बदलाव इस लिए कि किसी की पढ़ाई का नुकसान न हो और कोई अपने पद का दुरुपयोग न कर पाये । इस प्रकार मास्साब पूरी तरह से आश्वस्त थे कि उनकी कक्षा के बच्चे सबसे सुधरे हुए हैं ।
मास्साब पूर्व सैनिक होने के नाते खेल और व्यायाम में भी बहुत रुचि रखते थे और छात्रो को इसमे हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते थे । इसके अलावा पूरे स्कूल में कोई भी आयोजन हो उसकी जिम्मेवारी मास्साब की ही होती थी। बच्चों में स्वभावत: खेल में ज्यादा रुचि होती है । इसलिए वे आशा लगाये रहते थे कि मास्साब उन्हे मौका देगें । जैसा मैं पहले बता चुका हूं कि उनकी नज़र में सारे छात्र समान थे अत: वे सबको कुछ न कुछ जिम्मेवारी देते और सबको आयोजन से जोड़े रखते । जब किसीसे बात करते तो उसे ऐसा महसूस करा देते कि वह पूरे आयोजन में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है । जहां उनके अनुशासन से बच्चे उनसे कन्नी काटते, उनके इस गुण से उनके करीब भी होते थे ।
आज जगह जगह शिक्षा की दुकाने खुल गयी हैं और शिक्षा के मायने भी बहुत बदल गये हैं । ऐसी दंड प्रक्रिया भी पूर्णतया निषेध हो गयी है । परन्तु हम जब पी टी एम के दिन अपने बच्चों के स्कूल जाते हैं और आज के टीचरों की बातें सुनते है तो हमे अपने ऐसे पुराने शिक्षकों की याद आती है और बड़ी श्रद्धा से आती है । मैं क्षमा प्रार्थना के साथ कहना चाहूंगा कि अब वह विश्वास और समर्पण भाव नज़र नही आता, सिर्फ़ ताम-झाम ज्यादा नज़र आता है । हमारे मास्साब ने दंड प्रक्रिया दिल की गहरायी से छात्रों मे अनुशासन लाने के लिये ही अपनायी थी, किसी को चोट पहुचाने, घायल करने या ट्यूसन के लिये मज़बूर करने के लिये नहीं । आज जब वह इस दुनिया में नहीं हैं, उनका यह पूर्व छात्र उन्हें अपनी यादों की श्रद्धांजलि समर्पित कर रहा है ।
मास्साब का यह स्पष्ट मत था कि छात्रों को सुधारना बहुत ही आवश्यक है और सुधारने का एक ही तरीका है वह है डंडे का भरपूर इस्तेमाल । अपने इस विश्वास को वह पूरे मनोयोग से लागू करते थे । यह बात अपने ख़ास लहज़े मे बड़ी शान से हर मिलने वाले से बताते थे कि उनकी क्लास के सारे बच्चे हर टास्क ऐसी फ़ुर्ती से पूरा करते हैं जैसे "फिरकी" ज़रा सा हवा का सहारा पाते ही नाचती है । वैसे तो पूरे स्कूल का कोई बच्चा उनके सामने नहीं पड़ना चाहता था परंतु उनकी क्लास के बच्चों की तो मजबूरी थी । उनके सामने अगर अनुशासन टूटा तो तुरन्त सज़ा का फ़रमान मिल जाता था ।
उनका दंड विधान अलिखित होते हुए भी पूरा नियमबद्ध था । आप किसी भी परिस्थिति पर उनसे मुफ़्त क्लेरीफ़िकेसन ले सकते थे । यदि उन्होने एक बार सज़ा सुना दिया, चाहे उन्होने खुद अनुशासन हीनता देखी हो या किसी की शिकायत पर दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हो , आप नयी दलीलों के साथ उनसे दुबारा अपील कर सकते थे । लेकिन अगर ये दलीलें अपुष्ट और गलत हुईं तो सज़ा बढ़ जाती थी । अब इस अपील के बाद कोइ दूसरी अपील नहीं होती थी इस लिये सज़ा बढ़ने के डर से अपील का रिस्क कम ही लोग उठाते थे । यह कार्य एक न्यायाधीश की तरह वह पूरे निरपेक्ष भाव से करते थे।
सज़ा की मात्रा गलती के हिसाब से पूर्वनिर्धारित थी ,जिस प्रकार की और जितनी बड़ी गलती उसी हिसाब से उसकी सज़ा । जैसे क्लास के अंदर पढ़ाई हो रही हो और कोई खिड़की से बाहर झांक रहा है तो १/२ डंडा, यदि क्लास के बाहर मैदान में पढ़ा रहे हों और कोई सड़क की तरफ़ देख रहा हो तो १ डंडा, क्लास के बाहर इधर उधर घूम रहे हैं तो २ डंडे, होम वर्क करके नहीं लाये तो ३ डंडे, आपस में मार पीट कर रहे हो तो ४ या ५ डंडे। इसके अलावा पढ़ाई लिखाई में हुई अलग अलग गलतियों पर अलग अलग मात्रा निर्धारित थी । यह स्पष्ट कर दूं कि सज़ा १/४,१/२ और ३/४ डंडे भी होती थी । इसके लिए वे डंडे के उतने हिस्से पर पकड़ कर मारते थे, इससे उसकी चोट उसी मात्रा में कम लगती थी। यह उनकी अपनी खोज थी क्योंकि आज तक किसी और टीचर को एक डंडे से कम सज़ा देते मैनें नहीं देखा । बच्चे तो गलतियां दिन भर करते रहते थे और उनको दिन भर सज़ा भी सुनाई जाती रहती थी मगर सज़ा तुरंत नहीं मिलती थी । इसके लिए दो समय निर्धारित थे एक रेसिस से थोड़ा पहले और दूसरा दिन की छुट्टी से थोड़ा पहले । हर बच्चा अपनी दिन भर की सज़ाओं का लेखा रखता था, उपर्युक्त समय पर उनके पास जा कर हिसाब देता और सज़ा प्राप्त कर के खाता बन्द कराता। इसमें किसी तरह की गफ़लत करने पर सज़ा की मात्रा बढ़ जाती थी। यह एक तरह से टैक्स रिटर्न जैसा था कि आपको समय से भरना है नही तो पेनाल्टी पडेगी ।
उनका पढाई पर जितना ध्यान रहता उतना ही इस बात पर भी कि अगर जरा भी गलती हुई है तो सज़ा मिलना बहुत ज़रूरी है । इसे सुनिश्चित करने के लिए वह क्लास में दो या तीन मानीटर बनाते थे । यह नियुक्ति केवल एक दिन के लिये होती थी । उनकी नज़र में सारे छात्र एक समान थे इसलिए मानीटर के पद की नियुक्ति के लिये कोई विशेष गुण वाला छात्र नहीं खोजते थे यह मौका सब को मिलता था । दो या तीन मानीटर इस लिए कि उन्हें मास्साब के साथ पूरी क्लास पर नज़र रखना पड़ता था । किसी बच्चे का सिर ज़रा भी इधर उधर हुआ और उसके नाम का खाता खुला । प्रतिदिन मानीटर का बदलाव इस लिए कि किसी की पढ़ाई का नुकसान न हो और कोई अपने पद का दुरुपयोग न कर पाये । इस प्रकार मास्साब पूरी तरह से आश्वस्त थे कि उनकी कक्षा के बच्चे सबसे सुधरे हुए हैं ।
मास्साब पूर्व सैनिक होने के नाते खेल और व्यायाम में भी बहुत रुचि रखते थे और छात्रो को इसमे हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते थे । इसके अलावा पूरे स्कूल में कोई भी आयोजन हो उसकी जिम्मेवारी मास्साब की ही होती थी। बच्चों में स्वभावत: खेल में ज्यादा रुचि होती है । इसलिए वे आशा लगाये रहते थे कि मास्साब उन्हे मौका देगें । जैसा मैं पहले बता चुका हूं कि उनकी नज़र में सारे छात्र समान थे अत: वे सबको कुछ न कुछ जिम्मेवारी देते और सबको आयोजन से जोड़े रखते । जब किसीसे बात करते तो उसे ऐसा महसूस करा देते कि वह पूरे आयोजन में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है । जहां उनके अनुशासन से बच्चे उनसे कन्नी काटते, उनके इस गुण से उनके करीब भी होते थे ।
आज जगह जगह शिक्षा की दुकाने खुल गयी हैं और शिक्षा के मायने भी बहुत बदल गये हैं । ऐसी दंड प्रक्रिया भी पूर्णतया निषेध हो गयी है । परन्तु हम जब पी टी एम के दिन अपने बच्चों के स्कूल जाते हैं और आज के टीचरों की बातें सुनते है तो हमे अपने ऐसे पुराने शिक्षकों की याद आती है और बड़ी श्रद्धा से आती है । मैं क्षमा प्रार्थना के साथ कहना चाहूंगा कि अब वह विश्वास और समर्पण भाव नज़र नही आता, सिर्फ़ ताम-झाम ज्यादा नज़र आता है । हमारे मास्साब ने दंड प्रक्रिया दिल की गहरायी से छात्रों मे अनुशासन लाने के लिये ही अपनायी थी, किसी को चोट पहुचाने, घायल करने या ट्यूसन के लिये मज़बूर करने के लिये नहीं । आज जब वह इस दुनिया में नहीं हैं, उनका यह पूर्व छात्र उन्हें अपनी यादों की श्रद्धांजलि समर्पित कर रहा है ।
मंगलवार, 1 सितंबर 2009
चमचा पुराण
गांधी की जय से क्या होगा,
नेहरु की जय से क्या होगा,
भारत में जो भी कुछ होगा,
चमचागीरी से ही होगा ।
बोलो जप तप तीरथ करने से,
यहां किसे क्या मिल जाता है,
पर चमचागीरी करने भर से ही,
किस्मत का हर फाटक खुल जाता है ।
चमचागीरी है एक कला,
किंतु नहीं सिखलायी जाती है,
विद्यालयों के कमरों में भी,
यह नहीं पढाई जाती है ।
नभचर को बोलो कब कोई,
नभ में उडना सिखलाता है,
जलचर को भी बोलो कब कोई,
जल में तैरना सिखलाता है ।
ज्यों कश्मीर में केसर मिलता,
और केरल में काजू मिलता है ,
चमचागीरी का फूल हमेशा,
कुर्सी की क्यारी में खिलता है ।
चमचों की महिमा कौरव कुल से,
अब तक है चलती आयी ,
कवियों ने भी ऊचें स्वर में,
चमचों की महिमा है गायी ।
ज्यों रिश्वत के बिना ,
काम न कोई बन पाता है ,
वैसे ही कुर्सी और चमचे का ,
जनम जनम का नाता है ।
फिर भी यह एक पहेली है,
जो नही सुलझने पायी है ,
कुर्सी के बाद चमचा आया है,
या चमचे के बाद कुर्सी आयी है ।
है मिलावट आज सब जगह,
इसीलिये तुमको समझाता हूं,
असली और नकली चमचों की,
पहचान तुम्हे करवाता हूं ।
नकली चमचा कुछ देर बाद में,
मौसम सा रंग बदलता है,
असली चमचा वो है जो,
गिरगिट से पहले रंग बदलता है ।
तुम भी चमचे बन सकते हो,
बस स्वाभिमान का दमन करो,
अपने सब काम बनाने को,
सारे आदर्शों का हवन करो ।
चमचा तुम सा ही होता है,
बस केवल नाक नहीं होती,
वह सब धर्मों से ऊंचा है,
चमचों की जात नहीं होती ।
तुम झूठे मन से बोल रहे ,
गांधी की जय नेहरु की जय,
मैं सच्चे मन से बोल रहा,
चमचों की जय चमचों की जय ।
मुट्ठी भर लोगों से बोलो कब तक,
यह गांधी युग है चलने वाला ,
अरे गांधी युग जल्द जायेगा,
अब चमचा युग है आने वाला ॥
******************************
यह पैरोडी आज से दस साल पहले किसी मित्र ने लिख कर दिया था । उन्हे भी किसी और ने लिख कर दिया था । इसके रचयिता का नाम मुझे नही पता । यदि किसी को पता हो तो अवश्य बतावें । धन्यवाद ।
नेहरु की जय से क्या होगा,
भारत में जो भी कुछ होगा,
चमचागीरी से ही होगा ।
बोलो जप तप तीरथ करने से,
यहां किसे क्या मिल जाता है,
पर चमचागीरी करने भर से ही,
किस्मत का हर फाटक खुल जाता है ।
चमचागीरी है एक कला,
किंतु नहीं सिखलायी जाती है,
विद्यालयों के कमरों में भी,
यह नहीं पढाई जाती है ।
नभचर को बोलो कब कोई,
नभ में उडना सिखलाता है,
जलचर को भी बोलो कब कोई,
जल में तैरना सिखलाता है ।
ज्यों कश्मीर में केसर मिलता,
और केरल में काजू मिलता है ,
चमचागीरी का फूल हमेशा,
कुर्सी की क्यारी में खिलता है ।
चमचों की महिमा कौरव कुल से,
अब तक है चलती आयी ,
कवियों ने भी ऊचें स्वर में,
चमचों की महिमा है गायी ।
ज्यों रिश्वत के बिना ,
काम न कोई बन पाता है ,
वैसे ही कुर्सी और चमचे का ,
जनम जनम का नाता है ।
फिर भी यह एक पहेली है,
जो नही सुलझने पायी है ,
कुर्सी के बाद चमचा आया है,
या चमचे के बाद कुर्सी आयी है ।
है मिलावट आज सब जगह,
इसीलिये तुमको समझाता हूं,
असली और नकली चमचों की,
पहचान तुम्हे करवाता हूं ।
नकली चमचा कुछ देर बाद में,
मौसम सा रंग बदलता है,
असली चमचा वो है जो,
गिरगिट से पहले रंग बदलता है ।
तुम भी चमचे बन सकते हो,
बस स्वाभिमान का दमन करो,
अपने सब काम बनाने को,
सारे आदर्शों का हवन करो ।
चमचा तुम सा ही होता है,
बस केवल नाक नहीं होती,
वह सब धर्मों से ऊंचा है,
चमचों की जात नहीं होती ।
तुम झूठे मन से बोल रहे ,
गांधी की जय नेहरु की जय,
मैं सच्चे मन से बोल रहा,
चमचों की जय चमचों की जय ।
मुट्ठी भर लोगों से बोलो कब तक,
यह गांधी युग है चलने वाला ,
अरे गांधी युग जल्द जायेगा,
अब चमचा युग है आने वाला ॥
******************************
यह पैरोडी आज से दस साल पहले किसी मित्र ने लिख कर दिया था । उन्हे भी किसी और ने लिख कर दिया था । इसके रचयिता का नाम मुझे नही पता । यदि किसी को पता हो तो अवश्य बतावें । धन्यवाद ।
शनिवार, 29 अगस्त 2009
आधुनिक नैतिकता
क्या ज़ायज है ?
नियम के दायरे में खेलना,
या हर हाल में विजेता होना ।
यकीनन दोनो ही,
तुम्हारा नियम के दायरे में खेलना,
मेरा हर हाल में विजेता होना।
नियम के दायरे में खेलना,
या हर हाल में विजेता होना ।
यकीनन दोनो ही,
तुम्हारा नियम के दायरे में खेलना,
मेरा हर हाल में विजेता होना।
मंगलवार, 25 अगस्त 2009
वियोग के क्षण
इस वीराने अन्धियारे के बीच,
इस अल्प प्रकाशित कमरे में,
इस अर्ध रात्रि की बेला में,
मैं हूँ मेरा अकेलापन है,
सबको समेटे खामोशी की चादर है।
जागती हुई मेरी आंखो में ,
बन्द पलकों के पीछे,
मेरे मन के पर्दे पर,
अगनित मनोभाव दर्शाते,
रूप तुम्हारा बिम्बित होता है।
कभी कुछ कहती हुई तुम,
कभी कुछ समझाती हुई तुम,
कभी बात बे बात झल्लाती हुई तुम,
कभी मनुहार करती हुई तुम,
अनेकों रूप तुम्हारा प्रकट होता है।
यदि मैं नींद में गहरे जाऊं,
शायद सपने में तुम आओ,
या शायद सिर्फ़ नींद ही आये,
न सपने आयें न तुम आओ,
नींद में तो सब कुछ अनिश्चित है।
इन जागती आखों बन्द पलकों में,
तुमसे हो रहा है मिलन,
इनके खुलते ही है तुमसे वियोग,
नींद में स्वप्न और स्वप्न में तुम्हारे आने की अनिश्चित्ता,
इनके बीच विकल मैं और मेरा असमंजस है।
इस अल्प प्रकाशित कमरे में,
इस अर्ध रात्रि की बेला में,
मैं हूँ मेरा अकेलापन है,
सबको समेटे खामोशी की चादर है।
जागती हुई मेरी आंखो में ,
बन्द पलकों के पीछे,
मेरे मन के पर्दे पर,
अगनित मनोभाव दर्शाते,
रूप तुम्हारा बिम्बित होता है।
कभी कुछ कहती हुई तुम,
कभी कुछ समझाती हुई तुम,
कभी बात बे बात झल्लाती हुई तुम,
कभी मनुहार करती हुई तुम,
अनेकों रूप तुम्हारा प्रकट होता है।
यदि मैं नींद में गहरे जाऊं,
शायद सपने में तुम आओ,
या शायद सिर्फ़ नींद ही आये,
न सपने आयें न तुम आओ,
नींद में तो सब कुछ अनिश्चित है।
इन जागती आखों बन्द पलकों में,
तुमसे हो रहा है मिलन,
इनके खुलते ही है तुमसे वियोग,
नींद में स्वप्न और स्वप्न में तुम्हारे आने की अनिश्चित्ता,
इनके बीच विकल मैं और मेरा असमंजस है।
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
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