रविवार, 21 मार्च 2010

डेविड कोलमैन हेडली की स्वीकारोक्ति ( १ )

जिस बात की आशंका शुरू से जताई जा रही थी वह सत्य निकली, आखिर डेविड हैडली ने अमेरिकी कोर्ट मे अपराध की स्वीकारोक्ति कर लिया है । अब जैसा भारतीय समाचार माध्यम बता रहे हैं उनसे दो तीन पहलू उभर कर आ रहे हैं ।

पहला यह बात पूरी तरह से साफ़ हो गयी है कि डेविड हैडली एक डबल एजेंट है । यानी वह एफ़ बी आई का एजेंट था जो पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान मे ड्रग के काले धंधे और उससे प्राप्त धन के आतंकवाद मे इस्तेमाल व इनमे शामिल लोगों की जानकारी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था । शायद हैडली दूसरे ग्रुप यानी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में जिन लोगों के संपर्क मे आया उनके उद्देश्यों से भी प्रभावित हो गया और उनका साथ देने लगा या यूं कहें कि वह उनमे से एक बन गया । जासूसी एजेंटों के बारे मे यह कोई नयी बात नहीं है ऐसा अक्सर पाया जाता है कि जासूसों को अपने लक्ष्य के बारे मे अंदर की खबर पाने के लिए टारगेट से घुल मिल कर उनमे से एक होना ही पड़ता है । तो क्या हैडली इसी प्रक्रिया के दौरान अपने को स्थापित करने के लिए मुंबई पर हमले का ताना बाना बुनने मे शामिल हो गया ।

यह प्रश्न उठाने के पीछे मेरे शक का कारण यह है कि डेविड जब भारत मे अपना जाल फैला रहा था और अपने टारगेट की रेकी कर रहा था तो वह एफ बी आई के रडार से बाहर नहीं था , यहां तक कि मुंबई हमलों के बाद भी जब वह भारत आया तो यह बात अमेरिकी एजेंसियों को मालूम थी, जिसे उन्होने भारतीय एजेंसियों को नहीं बताया । इससे यही लगता है कि मुंबई हमलों से पहले उसके अमेरिकी आका लोग यह सोचते होगें कि उसकी कार्यवाई का परिणाम और उस पर प्रतिक्रिया इतने बड़े पैमाने पर नहीं होगी और हमलों के बाद जब वह भारत आया तो वे नहीं चाहते होगें कि वह भारत मे पकड़ा जाय । भारत मे पकड़े जाने पर हैडली यदि मुंह खोल देता तो अमेरिकी चालों के कई भेद सबके सामने आ जाते, जो शायद अमेरिका की घोषित नीतियों से मेल न खाते हों ।

अब आज की परिस्थिति में हैडली भारत नहीं लाया जा सकता, उससे पूछताछ भी शायद ही हो सके और होगी भी तो अमेरिकी देखरेख में । इस हालात मे भारतीय एजेसियां जो भी उत्तर पायेंगी वह केवल और केवल अमेरिकी नजरिये वाला होगा । अब तक , सैनिक भाषा मे कहें तो हैडली की ’ डि ब्रीफ़िगं’ हो चुकी है, वह मृत्युदंड के भय से मुक्त है और कुछ अन्य आश्वासनों ने भी लैस होगा । इसके बाद उससे पूछताछ करके क्या हासिल होगा और जो पता चलेगा उससे सच्चाई से पर्दा उठेगा या उस सच्चाई से हम अवगत होगें जो अमेरिका चाहता है अमेरिका को सूट करता है , जिससे भारत और पाकिस्तान के बीच शक का जो महौल है वह कम नहीं होगा बल्कि और बढ़ेगा ।

(हम दूसरे और तीसरे पहलू पर विचार अगले हिस्सों मे करेगें )

शनिवार, 20 मार्च 2010

थोड़ा और उन्मुक्त

जीवन यात्रा के मध्यान्ह में,
एक दिन यूं ही बैठा था मै,
सोचता हुआ मन ही मन,
मूंद कर आखों की पलकें कुछ क्षण,
एक बार वापस जाऊं बचपन में,
फिर वो सब करूं जो किया था मैने,
वो भी करूं जो नहीं किया,
जो किया उसे उसी तरह से,
या किसी और तरह से,
जो नहीं किया डर के मारे,
उसे भी करूं सारे डर छोड कर किनारे,
सावन भादों के महीने में,
जलप्लावित तालाब में कूद जाऊं,
पार कर लूं एक ही गोते में,
या उसके काटता रहूं कई चक्कर ,
चढ़ जाऊं आम के ऊचें पेड़ की,
सबसे ऊचीं डाल पर,
तोड़ने वह पका आम,
जिसे देख कर कभी मन ललचाया था,
निकल जाऊं अकेले अंधेरी मध्य रात में,
खेतों की तरफ़, जहां है वह भूतों वाला बरगद,
उठा लूं अपनी साइकिल, चलाता रहूं यहां से वहां,
बिना किसी से पूछे, बिना बताए,
कह दूं सब टीचरों से,
मत पढ़ाओ मुझे केमिस्ट्री, बायोलोज़ी,
बस दे दो कहानियों की किताबें और पढ़ने दो वही,
वो जो क्लास में गुडिया सी थी प्यारी सी,
कर लूं उससे बहुत सारी फ़ालतू सी बातें,
जाड़े की सर्द रातों में सो जाऊं दादी की गोद में,
या उनींदा ही पड़ा रहूं चुपचाप,
चाहे कोई बुलाता रहे कितना भी,
इन्ही बेतरतीब से उठते खयालों के बीच,
सोचता रहा कि एक और यदि मिले मौका,
जी लूंगा अबकी बार थोड़ा और उन्मुक्त होकर,
पर आंख खोली तो बचपन न था वहां,
थे दो बूंद आंसू और उनसे भीगते मेरे गाल।

सोमवार, 15 मार्च 2010

महिला आरक्षण, महंगाई, पिछड़ा और सेकुलर राजनीति - भाग २(यक्ष प्रश्न का समाधान)

इस भाग मे इस यक्ष प्रश्न पर विचार करते हैं कि महिला आरक्षण पर कांग्रेस की जल्दबाजी के पीछे तत्कालिक और दीर्घकालिक रणनीति क्या है । यह मानना ही पड़ेगा कि एक राजनैतिक दल कोई ऐसा कदम नहीं उठायेगा जिससे उसे कोई तात्कालिक लाभ हो जाय चाहे दीर्घकालिक नुकसान हो, कम से कम जानबूझ कर तो नही ही उठायेगा । बल्कि वह तो ऐसा कदम उठायेगा जिससे उसे तात्कालिक कुछ नुकसान यदि हो भी जाय परन्तु दीर्घकालिक लाभ हो । मेरे विचार मे महिला आरक्षण पर कांग्रेस द्वारा इस समय उठाये कदम को इसी परिप्रेक्ष मे देखना उचित होगा ।

महंगाई की जवाबदारी से बचना तात्कालिक हो सकता है लेकिन यह मानना मूर्खता होगी कि कांग्रेस ने तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान उठायेगी । बल्कि उसका आकलन यह होगा कि उसे दीर्घकालिक लाभ भी मिलेगा । इसके बाद यह बात विचारणीय हो जाती है कि क्या हैं वे दीर्घकालिक लाभ और यदि सारा क्रेडिट व लाभ सिर्फ़ कांग्रेस को मिलने वाला है तो देश की तीन बड़ी पार्टियों कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी व सी पी एम में , जो कि तीन अलग राजनैतिक विचारधाराओं के आधार पर चलती हैं उनमे एकमत क्यों और कैसे हो गया है । यह सब जानते हैं कि बहुत कम ही या यूं कहें कि शायद ही कोई विषय हो जिस पर ये तीनो एक मत होते हों , चाहे मामला आर्थिक हो, राजनैतिक हो या विदेश नीति का हो । अक्सर कुछ न कुछ विवाद अवश्य रहता है । ऐसे मे क्या वजह है कि महिला आरक्षण पर ऐसी एकजुटता कि सरकार के मित्र दलों के सांसदो को इतिहास मे पहली बार मार्शलों के ज़रिये राज्यसभा से बाहर कर दिया गया ? बिना बहस के वोट कराने की तैयारी कर ली गयी, फिर झट से एक बह्स भी हो गयी जिसे संज्ञा दी गयी कि यह एक डि फक्टो बह्स थी जो डि ज्युरे भी मान ली गयी । भाई वाह ऐसा सामंजस्य कि पिछले बीस सालों मे पहली बार ऐसा मौका आया कि कोई सरकार गिराने के मुद्दे को छोड़ कर एक सकारात्मक मुद्दे पर तथाकथित सेकुलर राजनीति के पुरोधा जो सेकुलरिज्म का सर्टिफ़िकेट भी बांटते रहते हैं उन्होने भाजपा के साथ सुर मे सुर मिलाया और वोट किया ।

राजनीतिक इतिहास मे १९८९-९० एक मील का पत्थर जैसा है । इस वर्ष मंडल कमीशन के आंदोलन और उसके प्रत्युत्तर मे राममंदिर आंदोलन के बाद से अन्य पिछड़ा वर्ग व मुस्लिम वोटों का जो ध्रुवीकरण हुआ है कि ये दोनो वर्ग पूरी राजनीति का केंद्रबिंदु हो गये हैं । सर्व श्री लालू यादव , मुलायम सिंह यादव और शरद यादव की तिकड़ी ने सत्ता की चाभी लगभग अपने हाथ मे रख ली है । आप यह देख सकते हैं कि कोई भी सरकार बननी इन तीनो मे से एक या दो को साथ लिए बिना असंभव सी हो गयी है । इस राजनैतिक ताकत के आगे कांग्रेस , भाजपा और कम्युनिस्ट यानी तीनों विचारधारा वाली राजनैतिक शक्तियां अपने आप को बंधन युक्त पाती हैं और कुछ हद तक राजनैतिक ब्लैकमैल की शिकार भी । इन परिस्थितियों मे इनका तोड़ तो एक ही संभव है कि या तो इनके वोट बैंक में बिखराव हो या एक नया वोट बैंक खड़ा हो जो इनकी ताकत को घटा दे ।

तो असल मे यक्ष प्रश्न यही है कि क्या तीनो राष्ट्रीय पार्टियों और उनमे से ख़ासकर कांग्रेस के विचार मे यह नया वोट बैंक ओबीसी और माइनॉरिटी वोट बैंक की मौजूदा धार को कुंद करके उनकी सीटों को बढ़ाने मे सहायक होगा । इसी लिए कांग्रेस के कोर ग्रुप जिसमे अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री के अलावा कांग्रेस पार्टी के चाणक्य श्री प्रणव मुखर्जी ने ऐसा दांव खेला है कि महंगाई की चर्चा अब नेपथ्य मे चली गयी, हंगामा महिला आरक्षण पर हो रहा है और साथ ही भाजपा व कम्युनिस्ट दिल मसोस कर समर्थन देने के लिए बाध्य हैं, आखिर मुख्य श्रेय कांग्रेस ले भी ले तो भी जितना संभव हो ये बेचारे भी कुछ तो लाभ पा ही जायेंगे । इस तरह के साफ़ संकेत तीनों राष्ट्रीय दलों की मीडिया पोजिशनिंग से मिल भी रहा है । इसके उलट अगर भाजपा व कम्युनिष्ट यदि बिल का एनकेनप्रकारेण विरोध करेंगे तो भी कांग्रेस तो लाभ मे ही रहेगी , भाजपा और कम्युनिष्टों के हिस्से केवल महिला विरोधी होने की बदनामी ही आयेगी जिससे महिला वोटों का नुकसान होगा । यानी कांग्रेस के दोनो हाथों मे लड्डू है । यदि यह सब संभव हुआ तो सबसे अधिक नुकसान यादव तिकड़ी को होगा और अन्य पिछड़े व अल्पसंख्यक वोट बैंक के कमजोर पड़ते ही इनकी राजनैतिक ताकत का भी पराभव हो सकता है । यही वजह है कि ये तीनो सबसे ज्यादा विरोध कर रहे हैं व कुछ हद तक बौखलाए भी हुए हैं ।


अन्त मे वही प्रश्न फिर से कि क्या यह महिला आरक्षण का मुद्दा महंगाई से ध्यान हटाने के साथ साथ पिछड़े और सेकुलर राजनीति का अन्त कर देगा ? इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ मे है । यह मुद्दा जैसे जैसे आगे बढ़ेगा , नयी नयी परिस्थितियां उत्पन्न होंगी उन पर हम सब विचार प्रकट करते रहेंगे ।

शनिवार, 13 मार्च 2010

महिला आरक्षण, महंगाई, पिछड़ा और सेकुलर राजनीति - भाग १

यूपीए और श्री मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार के एक वर्ष पूरे होने मे अभी कुछ महीने शेष हैं लेकिन इस बीच महौल राजनैतिक सरगर्मी से काफी भर गया है । यह किसी सरकार के लिए कुछ जल्दी लगता है क्योंकि पहले एक वर्ष या उससे कुछ ज्यादा ही समय तक अक्सर सरकारें हनीमून पीरियड का अनुभव करती हैं। वैसे तो समर्थक मीडिया के चलते श्री मनमोहन सिंह का पहला पूरा कार्यकाल हनीमून का रहा था क्योंकि मीडिया उनकी सरकार पर नज़र रखने के बज़ाय मुख्य विपक्षी दल भाजपा के पीछे पड़ा रहा था । परन्तु दूसरे कार्यकाल मे सरगर्मी कुछ जल्दी ही झेलनी पड़ रही है । इसका कारण है कि इस दस महीने मे महंगाई चरम पर पहुंच गयी है । सरकार अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ने पर टरकाऊ जवाब दे कर बच निकलती है परन्तु खाद्य पदार्थों के दाम बेतहासा बढ़ने से अब यह संभव नही रहा । यह बात कृषि मंत्री शरद पवार के ज्योतिषी वाले जवाब के बाद सब समझ गये हैं ।

इस सबके साथ विपक्ष की पार्टियों मे अप्रत्यक्ष समझौते के तहत एकजुटता दिखी । इससे निपटने के लिए सरकार ने पहले वही पिछले १५ सालों से कामयाब फार्मूले का सहारा लिया कि भारतीय जनता पार्टी के साथ सेकुलर फोर्सेस कैसे खड़ी नज़र आयेंगी? लेकिन बात यह है कि महंगाई एक सर्वव्यापी विषय है जिसका असर सब पर पड़ता है इसलिए सारे विपक्षी दल सेकुलरिज्म की छूआछूत से परे हट कर, एक साथ दिख सकते हैं । साथ ही सरकार को कटघरे मे खड़े करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था और इसका लाभ विपक्ष ने उठाया । यह खबर भी जोरशोर से आ रही थी कि सारे दल मिल कर फ़ाइनेंस बिल पर कट मोसन लायेंगे । ऐसे मे साफ था कि विपक्षी एकता न टूटी तो सरकार गिर भी सकती है या छोटे छोटे दलों के हाथ ब्लैक मेल हो सकती है। इसी समय कुछ टीवी कार्यक्रमों के ज़रिये इस तरह के सवाल उठा कर महौल बनाने की कोशिश भी हुई कि कम्युनिस्ट और लालू, मुलायम कैसे भाजपा के साथ खड़े होगें लेकिन इसका असर न होते देख सरकार की ओर से एक धमाकेदार खबर आयी कि सरकार लोक सभा और विधान सभाओं मे महिलाओं को ३३% सीटें आरक्षित करने वाले महिला आरक्षण बिल को संसद के इसी सत्र मे पास करवायेगी ।

जो पहला सवाल मेरे मन मे आया कि इस बजट सत्र मे जहां सरकार की प्राथमिकता फ़ाइनेंस बिल होना चाहिए वहां यह नया फ़ोकस क्यों ? इस तरह का तुरत फ़ुरत का धमाकेदार निर्णय निकट के इतिहास मे एक बार पहले भी हो चुका है जब १९८९ मे तत्कालीन प्रधान मंत्री वी पी सिंह ने अपने सहयोगी से दुश्मन बने देवी लाल की किसान रैली के उत्तर में, रातों रात मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा करके पिछडों का मसीहा बनने की कोशिश की थी । इस प्रक्रिया में पिछडे वर्ग के सारे नेता देवी लाल से अलग हो गये थे जैसे लालू, मुलायम, शरद और नितीश । सभी जानते हैं कि श्री वी पी सिंह को इसका लाभ तो नहीं हुआ लेकिन उस राजनीति का असर गया नहीं है । इस पर चर्चा दूसरे भाग मे करेंगे ।

यह तो साफ ज़ाहिर है कि सरकार सोचती है कि इस बात पर हंगामा होगा । भाजपा कभी कांग्रेस के साथ मिल कर किसी बिल पर वोट नहीं करना चाहेगी और बहाने बनायेगी , साथ ही लालू मुलायम भी इसका समर्थन नहीं करेगें। इस अफ़रा तफ़री के महौल मे महंगाई की चर्चा नेपथ्य मे चली जायेगी । ऐसा कुछ हद तक हो भी गया लेकिन एक दांव उल्टा पड़ गया जब सरकार के समर्थक वर्ग भी उसकी नीयत पर सवाल उठाने लगे। यहीं सरकार घिर गयी, अब उसे अपनी साख बचाने के लिए राज्यसभा मे वोटिंग करवाने के लिए बाध्य होना पड़ा । इसमे फायदा उठाने के इरादे से यह प्रचारित करना शुरू किया गया कि श्रीमती सोनिया गांधी ने इस बिल को अपना निजी एजेंडा बना लिया है। राज्यसभा में वोटिंग के बाद श्रीमती सोनिया गांधी पहली बार खुल कर टीवी पर आयीं और अपने पसंदीदा चैनेल एनडीटीवी की बरखा दत्त को इंटरव्यू भी दिया और साथ ही संसद के बाहर सारे चैनेल्स को न्यूज बाइट भी दी । यह क्रेडिट लेने की जबरदस्त कोशिश थी जिसमे प्रधानमंत्री जी गायब दिखे और मीडिया ने इसका नोटिस भी लिया ।

इसके साथ एक कोलेट्रल डैमेज हुआ जिसमे सरकार को अपने ही मित्र पार्टियों के सांसदो को मार्शलों द्वारा सदन के बाहर निकलवाना पड़ा, जिससे उसके दोस्त बिदकते नज़र आ रहे हैं, उन्होने अपना समर्थन वापस ले लिया है । सरकार एक या दो सीटों से ही बहुमत मे बची है। ऐसे हालात में सरकार को हमेशा बचाव की मुद्रा मे रहना पड़ेगा । जिस बात से बचने के लिए महिला आरक्षण बिल को लाया गया वह स्थिति अब हमेशा खड़ी रहेगी । ऐसे हालात मे अब यह साफ नज़र आ रहा है कि कांग्रेस समझदारी दिखा रही है और जैसा १९८९ मे श्री वी पी सिंह ने किया था, उसके उलट कांग्रेस बात को ज्यादा दूर नहीं ले जायेगी । इस तरह ऐसा लगता है कि महिला आरक्षण विधेयक अब फिर एक बार सर्वानुमति की कोशिश के नाम पर लोकसभा मे या तो पेश ही नहीं होगा या पेश हुआ भी तो पास नहीं होगा और लटका रहेगा ।

(महिला आरक्षण बिल के केंद्र बिंदु बनने से संभावित दूरगामी राजनैतिक परिणाम पर विचार अगले भाग मे प्रस्तुत करूंगा )

शनिवार, 6 मार्च 2010

मक़बूल फ़िदा हुसैन के बहाने

हुसैन की पेंटिंग, उनका विरोध और उनके निर्वासन के बारे मे बहुत कुछ लिखा जा रहा है । मेरे विचार मे हुसैन का विरोध ज्यादा इस कारण नही है कि इन पेंटिंगों मे हिंदू देवियों को नंगा दिखाया गया है । इस देश में ऐसे कई मंदिर हैं जहां नग्न अवस्था में मूर्तियां और भित्ति चित्र हैं और वे संस्कृति का हिस्सा हैं । यहां नागा साधुओं और दिगम्बर जैन संतों का ऐसा समाज है जो संस्कृति का हिस्सा है । वे सब नग्न रहते हैं क्योंकि इस बात में उनकी पवित्र आस्था है । लेकिन हुसैन साहब के बारे में यह सोच है कि जिन्हे हुसैन पसंद नही करते उसे नंगा दिखाते हैं । तो उनके द्वारा देवी देवताओं का नग्न चित्रण श्रद्धा के कारण नही बल्कि नफ़रत के कारण होना माना जा रहा है । इसके लिए उनकी हिटलर और मदर टेरेसा की पेंटिंग का उदाहरण दिया जाता है ।

दूसरा कारण यह भी है कि हुसैन की एक फिल्म मे एक गाने को लेकर मुस्लिम कट्टरवादियों द्वारा हंगामा किया गया था । उस गाने मे शायद नायिका के लिए " नूर अल नूर " शब्द का इस्तेमाल हुआ था, जिस पर विरोध करने वालों का कहना था कि इस शब्द से पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब (PBUH) को संबोधित किया जाता है इसलिए इसे किसी और के लिए इस्तेमाल नही किया जा सकता और इसे फिल्म से हटाया जाय । इसके जवाब मे हुसैन साहब ने फिल्म ही वापस ले ली, उसका वितरण और प्रसारण रोक दिया था और सारा आर्थिक नुकसान स्वंय उठाया था । जब उस समय उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्हों ने कहा था कि यह उनकी फिल्म है वे उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं और इस पर सफाई देना उनके लिए आवश्यक नहीं है । हो सकता है कि हुसैन साहब ने यह कदम दुखी होकर या बेबस होकर उठाया हो परन्तु हिंदू चरम पंथी इसे उनके व्यवहार मे दोहरे मानदंड के रूप मे साबित करते हैं । इससे यह कहा जाता है कि देखो जब मुसलमानों ने एक शब्द का मुद्दा उठाया तो फिल्म ही वापस ले ली , लेकिन हिंदू देवी देवताओं की नंगी तस्वीरें बना कर उनका अपमान कर रहे हैं और सीनाजोरी कर रहे हैं । इस पर उनका मुसलमान होना भी एक मुद्दा बन जाता है ।

भारत मे इस समय हर धर्म, जाति और क्षेत्र से एक अतिवादी वर्ग उभर कर सामने आ रहा है जो हंगामा खड़ा करने की कोशिश मे लगा रहता , क्योंकि इस बहाने से उसकी दुकानदारी चल जाती है । आज के हज़ार चैनेलों के युग में यह और भी आसान है। बस आप बीस पच्चीस आदमी जुटाइये और पांच दस चैनेल वालों को बुलाइये और तमाशा करिये , उसे फिल्मों जैसा शूट कर लिया जायेगा और फिर बार बार वही सीन टीवी पर ऐसे प्रसारित किया जाता है जैसे पूरा देश उस हंगामे मे शामिल है । इसका प्रभाव ज्यादा पड़ता है , वास्तविकता से कई हज़ार गुना ज्यादा । इसका फ़ायदा ऐसे अतिवादी लोग उठा रहे हैं और मीडिया अपनी टीआरपी के लिए इन्हे उकसाता भी रहता है ।

भारत सरकार, विभिन्न प्रदेशों की सरकारें और तथाकथित सेकुलर वर्ग भी हिंदू अतिवादियों का विरोध तो जम कर करते हैं, यहां तक कि उन्हे परास्त करने के लिए सारे नियम, कानून और भाषा संयम भी तोडने में उन्हे कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते। वहीं जब मुद्दा मुस्लिम और क्रिस्चियन चरम पंथियों का आता है तो विरोध नरम शब्दों नाम मात्र का होता है और कई बार सेकुलर ताकतें सहयोग की मुद्रा मे भी आ जाती हैं । जैसे कि सटानिक वर्सेस पर कांग्रेस सरकार, तस्लीमा नसरीन के मामले पर सीपीएम, मी नाथूराम गोड़से बोल्तोय के मामले पर महाराष्ट्र सरकार और द विंची कोड के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश की सरकार का उदाहरण सबके सामने है। ऐसे और भी बहुत उदाहरण गिनाये जा सकते हैं , इन से यह साबित होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकारों और सेकुलर वादियों और बुद्धिजीवियों के व्यवहार मे सम रूपता नहीं है । यह किसी न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई के बज़ाय अहं और राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई नज़र आती है ।

सरकार को एक नीति बनानी चाहिए और उस पर एक सा व्यवहार करना चाहिए, इसके लिए यदि राजनैतिक कीमत भी यदि देनी पड़े तो भी , वरना यह सब सिर्फ़ तमाशेबाजी ज्यादा कुछ नहीं माना जायेगा ।

और अन्त में हुसैन को कतर जैसे देश में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी यह सोचना मूर्खता ही होगी, कतर कोई अमेरिका या यूरोप नहीं है । इस तरह की गफ़लत जो तथाकथित सेकुलर फैला कर प्वाइंट स्कोर करने की कोशिश कर रहे हैं, वह सिर्फ़ और सिर्फ़ हास्यास्पद है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जहां जन्म की ठांव

पिछले दिनों मैं अपने शहर सुल्तानपुर गया था, जो लोग नहीं जानते हों , इसी जिले की अमेठी सीट से श्री राहुल गांधी लोक सभा सांसद हैं । अमेठी से पहले श्री संजय गांधी, श्री राजीव गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी सांसद रह चुके हैं ।

चाहे शिव सेना और राज ठाकरे की "मनसे" कुछ भी कहे लेकिन जिस भूमि मे पैदा हुए और बचपन बीता वहां के लिए मन में अज़ब सा प्रेम भरा उत्साह हमेशा रहता है ।

एक नाराजगी भरा दोहा महा कवि रहीम का भी है :

रहिमन वहां न जाइये जहां जन्म की ठांव,
गुन अवगुन देखत नहीं लेत पाछिलो नांव ।


वैसे कवि रहीम ने यह बात दूसरे संदर्भ मे कही , उन्हे इस बात का सर्टिफिकेट नहीं देना था कि आप जन्म भूमि और कर्म भूमि मे किसे ज्यादा महत्व देते हैं बल्कि उन्हे शायद यह मलाल था कि अपने जीवन मे कितने ऊचें मकाम तक पहुंच जाओ, बचपन के मित्र बचपन वाले तरह से व्यवहार करते हैं । जबकि मुंशी प्रेमचन्द ने "गुल्ली डंडा" कहानी मे इसके विपरीत अनुभव लिखा, जहां नायक यह पाता है कि जब वह बड़ा अफ़सर बनने के बाद गांव जाता है तो बचपन का उसका दोस्त, जो अभी भी गांव मे रहता है उससे जान बूझ कर गुल्ली डंडे के खेल मे हार जाता है । इस बात से नायक दुखी होता है । खैर दोनो बातें अपनी तरह से ठीक हैं, हम सबको दोनो तरह के अनुभव होते रहते हैं।

मुझे यह दोनो बातें इस लिए याद आयीं क्योंकि इस यात्रा मे मैं अपने बाल सखा और अब सुल्तानपुर स्थित के एन आई आई टी के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर ( डॉ ) के. एस. वर्मा से करीब पन्द्रह वर्ष बाद मिला, समयाभाव के कारण मुलाकात केवल पंद्रह बीस मिनट की रही और मुझे यह लगा कि शायद हम दोनो ही बचपन से आगे निकल आये हैं और कितना खुल कर कैसे व्यवहार करें इसकी द्विविधा महसूस कर रहे हैं ।

इन बातों से इतर, मैने कुछ फोटो अपने मोबाइल से लिए , जो नीचे दे रहा हूं, जो लोग सुल्तानपुर से हैं या कभी गये हैं उनकी याद ताज़ा हो जायेगी और जो नहीं गये उन्हे अपने शहर का चौक याद आ जायेगा । इस वसंत ऋतु में सरसों के पीले फूलों वाले खेत भी याद आ जायेंगे ।




सुल्तानपुर चौक






गुड़ मंडी के पास के बाज़ार की गलियां





वसंत ऋतु में सरसों के खेत



शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

एक फ़ालतू सी फिल्म है माई नेम इज़ खान

मेरा मानना है कि यह एक साधारण फिल्म है जो आज देश मे एक असाधारण माहौल की वजह से बिना मतलब के तारीफ़ बटोर रही है । यह फिल्म अमेरिका के ईराक़ तथा अफ़गानिस्तान युद्ध के बाद से पश्चिमी देशों मे उठे सवालों को अपनी समझ के हिसाब से डील करती है । फिल्मकार बहुत सारी बातें एक साथ डील करने की कोशिश मे है । हीरो को बिमारी है, वह मुसलमान है, उसे एक हिन्दू लडकी से प्यार करता है जो एक बच्चे की मां है, वह परी कथाओं का सा प्रेमी है जो प्यार को पाने के लिए हर हद को पार करता है । जो क्रिस्चियन बहुल समाज मे शक़ की नज़र से देखे जाने का प्रतिकार करता है ( वैसे शाहरुख़ खान करीब ६ महीना पहले अपनी सुरक्षा जांच पर बता ही चुके हैं कि वे खान थे तभी उन्हे रोका गया ,जबकि इसी देश के जार्ज फर्नाडीस सहित कितने लोगों की जांच हो चुकी है )। काई सारी बातें जो हंगामा कर सकने वाली हैं जो जान बूझ कर डाली गयीं है पर हंगामे का मौका अप्रत्यासित तौर पर दिया शिवसेना ने, जो राज ठाकरे का जवाब देने के लिए मौके के लिए बेकरार है चाहे सही या गलत ।

एक व्यक्ति जो ताकतवर के अन्याय ( सचमुच का या काल्पनिक ) से लड़ने का हौसला रखता है और इतना गुणी है ऊपर से बीमारी ग्रस्त है से हर कोई सहानुभूति रखेगा । साथ मे अगर शिव सेना जैसे नालायक दल हों जो बेकार का विरोध करें और राजीव शुक्ला जैसे दोस्तों ( वैसे पिछले १५ अगस्त को शाहरुख़ की जांच के हंगामे की शुरुआत शुक्ला जी द्वारा ही हुई थी ) से सुसज्जित कांग्रेस पार्टी के युवराज का सीधा समर्थन हो तो क्या कहने। इस देश मे जो भेड़ चाल वाला मीडिया सर्कस होता है उसमे एक साधारण सी फिल्म असाधारण ही बन जायेगी । इतनी पुलिस एक फिल्म दिखाने के लिए मौजूद थी , जब यूपी बिहार के लोग पिट रहे थे तब कहां थी । उसकी गोली चली भी तो एक निहत्थे, बेरोज़गार, गरीब बिहारी युवक को मारने के लिए । कहां थी सरकार कहां था कानून का राज । जो मंत्री फिल्म देखने के लिए आये थे वे क्या कर, कह व बोल रहे थे । इसके पीछे की राजनीति के खुलासे की अपेक्षा प्रबुद्ध पत्रकारों से रहेगी ।

यह एक लम्बी, उबाऊ और पश्चिमी देशों मे उठ रहे सवालों का उत्तर ढ़ूंढ़ती फिल्म है जिसका भारत की वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है । वैसे भी शाहरुख की फिल्में ओवर्सीज मार्केट के लिए बनती हैं और यह उसी तरह की है इसी लिए शाहरुख़ इसके प्रचार के लिए देश के बाहर ज्यादा वयस्त रहे । शिवसेना ने जो प्रचार का मौका दिया उससे जो फ़ायदा मिला वह आइसिंग ओन केक जैसा है । संघ परिवार से नफ़रत करने वालों के लिए तो पता भी हिले वही काफ़ी है संघ पर टिप्पड़ी के लिए । देश के एलीट वर्ग का एक तबका किसी भी कीमत पर इस फिल्म को असाधारण साबित करने के लिए कटिबद्ध है ।

भारतीय मुसलमान समाज की सामयिक समस्यायों और आगे के रास्ते के बारे मे सही समझ वालों को आप लोग सुने और मौका दें तब न । मौलाना वहीउद्दीन की वार्ता के कुछ अंश उद्धरित किया है लिंक दे रहा हूं अगर समय मिले तो देखियेगा और अपना मत भी दीजिएगा ।
http://mireechika.blogspot.com/2009/12/blog-post_06.html