आज सबसे ज्यादा चर्चा खबरिया चैनेलों पर आईपीएल की हो रही है , दांतेवाड़ा पर कम और सुनन्दा पुश्कर पर ज्यादा समय लगा रहा है मीडिया । इस बीच थरूर साहेब सफाई दे रहे हैं कभी चैनेलों पर , कभी संसद को , कभी वित्त मंत्री को , कभी कांग्रेस अध्यक्ष को और अब प्रधान मंत्री को । बेचारे समझ नही पा रहे है कि उन्होने क्या गलती कर दी । इतने सुलझे हुए अधिकारी थे , यूएनओ मे पूरा कैरियर बिता कर आये , सारे विश्व के मीडिया की समझ रखते हैं , भाग्य साथ होता तो यूएन के सेक्रेटरी जनरल होते और पूरी दुनिया के मीडिया को संभाल रहे होते । लेकिन बेचारे जबसे मंत्री बने हैं एक कंट्रोवर्सी से दूसरी कंट्रोवर्सी मे फंसते और बचते समय बिता रहे हैं ।
थरूर साहेब बार बार कह रहे हैं कि सुनन्दा मेरी मित्र तो हैं मगर कोई रिश्ता नही है मतलब पत्नी नहीं हैं । वे बार बार समझा रहे हैं कि वे विदेश राज्य मंत्री हैं और आईपीएल उनके मंत्रालय का मामला नहीं है, लेकिन मीडिया के मित्रगण यह सब मानने और समझने को तैयार नही हैं । उनकी समझ मे यह भी नही आ रहा कि सुनन्दा को लाभ मिलने मे क्या गलत बात है ? आखिर पत्नी को लाभ दिलवाते तो गलत हो सकता था लेकिन महिला मित्र को लाभ कानूनी नज़र से घूस तो नहीं कहा जा सकता । अब नैतिकता का मुद्दा मत उठाइये वह तो केवल विरोधियों के लिए होता है ।
इस बात पर मुझे , बचपन मे हिंदी की मशहूर पत्रिका धर्मयुग मे फ़िराक गोरखपुरी साहेब के बारे मे छपा एक किस्सा जो उनके भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के अवसर का है वह स्मरण हो आया । उन्होने उस समय मंच से एक किस्सा सुनाया था जो कुछ इस तरह है :
एक बार एक नगर मे कुछ लोगों ने यह विचार किया कि अपने शहर की विधवा महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ करना चाहिए । लोगों ने तुरन्त एक विधवा कल्याण नाम से संस्था बना दी और नगर के एक बड़े समाजसेवक को इसका प्रधान नियुक्त कर दिया । उत्साही लोगों ने मिलकर घर घर जा कर इस संस्था के लिए चंदा भी इकट्टा किया । काफी धन इकट्ठा हो जाने के बाद लोगों ने सब कुछ प्रधान जी को सुपुर्द कर दिया । बहुत समय बीत गया तो लोगों को ध्यान आया कि प्रधान जी से जा कर मिला जाय और पता किया जाय कि विधवा कल्याण पर उन्होने क्या कदम उठाये हैं और भविष्य के लिए उनकी क्या योजना है । कई लोग प्रधान जी से मिलने उनके घर गये और शिकायत किया कि धन का क्या हुआ और वे उसे कैसे खर्च कर रहे हैं ?
प्रधान जी ने जवाब दिया - मित्रों , धन पूरी तरह सुरक्षित है और बैंक मे वैसा ही पड़ा है आप लोग बिल्कुल चिन्तित न होवें इसका सदुपयोग भी विधवा कल्याण के लिए ही होगा ’आखिर जब मैं मरूंगा तो मेरी पत्नी विधवा होगी कि नही’ ।
तो साहब थरूर हों , ललित मोदी हों या कोई और हो , खेल मे क्या रुचि ले रहा है और खेल का कितना कल्याण कर रहा है उसका तो पता नहीं लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने रिश्तेदारों और बेनामी तरीके से अपना कल्याण कर रहा है इसमे कोई दो राय नहीं है ।
सबसे बड़ी बात - इस तमाशे को टैक्स मे छूट दिया जा रहा है । यानी लूट चौतरफा ।
मनुष्य जीवन भर मंजिल की तलाश में भागता है और मंजिल उससे दूर होती जाती है, जैसे जल की तलाश में मृग मरू भूमि में मरीचिका का अनुभव करता है, संत कबीर के शब्दों में : पानी में है मीन पियासी
रविवार, 18 अप्रैल 2010
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
रक्तबीज
हर तरफ़ उगे हैं,
आइने ही आइने,
जिनमे दिखायी पड़ते हैं,
अनगिनत प्रतिबिंब।
चाहता हूं इनमे दिखें,
केवल मोहक मनभावन,
पर दिखायी देते हैं,
कुंठित और बीभत्स।
बीभत्सता जो है सृजित,
हमारे कलुषित विचारों से,
जो है पोषित पुष्पित पल्लवित,
द्वेष लालच व साज़िश से।
जब बंद करता हूं आखें,
तो सारे बिंब समाते मस्तिष्क में,
रोक लूं आखों को देखने से,
कैसे रोकूं सोचने से मस्तिष्क को।
क्या करूं कैसे बचूं,
मारकर पत्थर जो तोड़ा इनको,
हर टूट से बनेंगे सैकडों आइने,
और उनमे उतने ही प्रतिबिंब।
रुक गया हाथ रख दिया पत्थर,
समझ गया कि समाधान पत्थर नहीं,
इसके प्रहार से जन्म लेता है रक्तबीज,
जो केवल बढ़ाता है बीभत्सता।
आइने ही आइने,
जिनमे दिखायी पड़ते हैं,
अनगिनत प्रतिबिंब।
चाहता हूं इनमे दिखें,
केवल मोहक मनभावन,
पर दिखायी देते हैं,
कुंठित और बीभत्स।
बीभत्सता जो है सृजित,
हमारे कलुषित विचारों से,
जो है पोषित पुष्पित पल्लवित,
द्वेष लालच व साज़िश से।
जब बंद करता हूं आखें,
तो सारे बिंब समाते मस्तिष्क में,
रोक लूं आखों को देखने से,
कैसे रोकूं सोचने से मस्तिष्क को।
क्या करूं कैसे बचूं,
मारकर पत्थर जो तोड़ा इनको,
हर टूट से बनेंगे सैकडों आइने,
और उनमे उतने ही प्रतिबिंब।
रुक गया हाथ रख दिया पत्थर,
समझ गया कि समाधान पत्थर नहीं,
इसके प्रहार से जन्म लेता है रक्तबीज,
जो केवल बढ़ाता है बीभत्सता।
रविवार, 4 अप्रैल 2010
सानिया मिर्ज़ा की शादी
सानिया की शादी पर इतना बवाल क्यों हो रहा है , इससे बढ़कर यह सवाल है कि यह बवाल उचित है या नहीं ? भारतीय उपमहाद्वीप मे शादी ब्याह तो खुशी का ऐसा मौका होता है जिसमे दो व्यक्ति तो जीवन भर के लिए एक दूसरे से जुड़ते ही हैं दो परिवार भी साथ साथ जुड़ते हैं । इसके अतिरिक्त यह व्यक्तिगत से बढ़कर सामाजिक रिश्ता भी होता है । विवाह दो परिवारों व दो समाजों के बीच एक जुड़ाव की कड़ी के रूप मे होता है । समाज का निर्माण मनुष्य के व्यापारिक रिश्तों और वैवाहिक रिश्तों से ही होता है । इसीलिए इसकी कामयाबी के लिए सबका साथ , आशीर्वाद और शुभकामनाएं ली जाती हैं ।
सानिया और शोएब की शादी का मामला सीधा नहीं है इसमे एक नही कई मोड़ हैं । मै किसी के व्यक्तिगत मामलों पर कभी नहीं लिखता लेकिन इस मामले मे हो रहा हंगामा इसे व्यक्तिगत के दायरे से बाहर ला रहा है । सानिया इस देश की बेटियों के लिए आदर्श हैं , मैने खुद अपनी एक कविता मे उनका ज़िक्र किया है । कुछ साल पहले जब किसी मौलवी ने उनकी ड्रेस को लेकर फ़तवा दिया था तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ था । इसके अलावा भी सेलिब्रटी होने के कारण उनके बारे मे छोटी बड़ी बाते समाचार बनती ही रहती हैं । इस लिहाज से उनकी शादी पर चर्चा तो स्वाभाविक है और जब शादी एक पाकिस्तानी क्रिकेट स्टार से हो तो चर्चा और भी लाज़िमी है । लेकिन यह चर्चा खुशनुमा और पॉजिटिव के बज़ाय नेगेटिव हो रही है । इस खुशी की बात को नेगेटिव मोड़ पर लाने क्या क्या पहलू हैं , एक नज़र उनपर डालते हैं ।
सोहराब मिर्ज़ा पहलू :
सानिया की सगाई जुलाई ०९ मे सोहराब मिर्ज़ा से तय हुई , पूरे ज़श्न के माहौल मे , दोनो की तस्वीरें मीडिया मे आयीं , लेकिन सगाई छ: महीने मे टूट गयी , कारण का खुलासा नही हुआ । दोनो परिवारों ने केवल यह कहा कि सोहराब और सानिया दोनो ने अपनी इच्छा से अलग होने का फ़ैसला किया है । अब सानिया ने इस बात का खुलासा किया है कि अब से करीब छ: महीने पहले ( यानी सोहराब से सगाई के तीन महीने बाद ) से उनके और शोएब के बीच डेटिंग चल रही है । हमे सानिया की बात का विश्वास करना चाहिए , फिर भी भारतीय समाज के हिसाब से यह अजीब ही है कि सगाई के बाद सानिया किसी दूसरे के साथ डेटिंग कर रही थीं ।
या सच यह हो सकता है , जैसी कि अफ़वाह है , कि सानिया सोहराब से शादी करना ही नही चाहती थी , उन्हे शुरू से ही शोएब से शादी करनी थी लेकिन उनका परिवार उनके पाकिस्तान मे बसने और शादी के बाद टेनिस छोड़ देने की शोएब की शर्त मानने लिए तैयार नही था । इसके पीछे भारत पाकिस्तान के बीच के हालात भी एक कारण हो सकता है । इस लिए सोहराब जो कि एक पारिवारिक मित्र हैं उनसे सानिया की सगाई कर दी गयी । इस बात का इशारा कुछ महीने पहले के सानिया के एक इन्टरव्यू से मिलता है , जब उन्होने यह कहा था कि जब खेलना है तो शादी क्यों करें । लगता है कि सोहराब से सगाई के बाद शोएब तथा उनके परिवार पुनर्विचार करने पर मजबूर हुआ और इन दोनो बातों पर छूट देने के लिए राज़ी हो गया । इसी लिए यह बात जोर देकर कही गयी कि दोनो शादी के बाद दुबई मे रहेंगे और सानिया भारत के लिए खेलती रहेंगी । इससे भारत मे मौजूद पाकिस्तान विरोधी माहौल को सानिया विरोधी बनने से रोकने मे थोड़ी सहायता भी मिली है ।
लेकिन दोनो सूरतों मे सोहराब मिर्ज़ा के नज़रिये से देखें तो बेचारे इस्तेमाल ही हुए ।
राजनैतिक और सांप्रदायिक पहलू :
भारत मे कुछ राजनैतिक दल ( जैसे कि शिव सेना ), समाजवादी पार्टी के अबु आज़मी और कुछ अराजनैतिक हंगामा ग्रुप ( जैसे प्रमोद मुथालिक की श्री राम सेना ) जैसे लोग हैं जिनका एक ही काम है कि किसी भी मुद्दे को लेकर उसे या तो साम्प्रदायिक रंग दे देते हैं या उसे भारतीय संस्कृति पर हमला घोषित कर देते हैं । कोई किसी से शादी कर रहा है इसमे क्यों हाय तोबा । लेकिन अजीब बात है कि बाल ठाकरे जैसा व्यक्ति संपादकीय लिख रहा है , उनके कार्यकर्ता पोस्टर जला रहे हैं और सानिया को भारत से नही खेलने देने की घोषणा कर रहे हैं । बहुत दिनो से सोये पड़े प्रमोद मुथालिक को भी टीवी पर आने का मौका मिल गया ।
यह सब ज्यादा से ज्यादा मीडिया पोजिशनिंग से अधिक कुछ नही है । भारत मे आज के माहौल मे ऐसी बातों पर लोग थोड़ा बहुत कन्सर्न भले जता दें लिकिन उद्द्वेलित नही होते । इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस बात पर मामला गर्म रहेगा । वैसे भी शादी के बाद लडकी अपने ससुराल जाती ही है , यहां तो लड़की को पराया धन ( यानी पति के परिवार की ) मानते ही हैं । बस थोड़ी बहुत कसक यदि है तो वह पाकिस्तान को लेकर है , दूल्हा अगर पाकिस्तानी नही होता तो इनमे से किसी को अपनी राजनीति चमकाने का मौका नही मिलता । लेकिन अब इस बात को ज्यादा मुद्दा बनाने का कोई लाभ नहीं ।
आयशा सिद्दीक़ी पहलू :
आयशा हर टीवी चैनल पर छायी हुई हैं । उन्हे पूरी सहानुभूति भी मिल रही है । उन्होने इतना सबूत तो लोगों के सामने रख ही दिया है कि शोएब का चरित्र शक के दायरे मे आ गया है । अब यह तो साफ है कि निकाह हुआ था , अब शोएब की तरफ से यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि निकाह नामा तो है लेकिन प्रोसेस पूरा नही हुआ । इससे साफ जाहिर होता है कि दाल मे कुछ काला तो है । आज जब शोएब और सानिया एक पवित्र रिश्ते मे बंधने जा रहे हैं तो यह शक और धोखे का माहौल ठीक नहीं है । यदि सचमुच आयशा के साथ निकाह हुआ था तो यह शादी सानिया ,आयशा और कानून सब के साथ अन्याय होगा । इसलिए स्थिति साफ हो तो अच्छा होगा नही तो बाद मे इसका परिणाम ज्यादा दुखद हो सकता है ।
अंत मे शोएब पहलू :
शोएब मलिक की एक ही छबि हमारे मन मे बसी हुई है जब ट्वन्टी-ट्वन्टी विश्व कप के फाइनल मे भारत से हारने के बाद उन्होने पूरे दक्षिण एशिया के मुसलमानों से माफ़ी मागी थी कि उनके लिए वे विश्व कप नही जीत पाये , यानी उस भारत से हार गये जो हिंदू बहुल है । यह उस पाकिस्तानी मानसिकता को ज़ाहिर कर रहा था जो मानता है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान ही मुसलमानो का प्रतिनिधित्व कर सकता है ।
ऐसे व्यक्ति से क्या हम यह उम्मीद करें कि वे अपनी पत्नी को यह छूट देगें कि वे भारत की नागरिक बनी रहें , भारत के लिए खेले और मेडल जीते । लेकिन जब ऐसी घोषणा सानिया और शोएब दोनो ने किया है तो शायद हो सकता है कि शोएब बदल गये हैं या सानिया ने बदलने पर मजबूर कर दिया है या फिर बाद मे सानिया बदल जायेंगी । यह तो समय ही तय करेगा ।
आज तो केवल इतना ही : सानिया-शोएब को सुखी और सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएं । शायद इससे भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ मिठास आये ताकि सम्बन्ध अच्छे बने और आज जो नेगेटिव चर्चा है उसका परिणाम पॉजिटिव हो । आमीन ।
सानिया और शोएब की शादी का मामला सीधा नहीं है इसमे एक नही कई मोड़ हैं । मै किसी के व्यक्तिगत मामलों पर कभी नहीं लिखता लेकिन इस मामले मे हो रहा हंगामा इसे व्यक्तिगत के दायरे से बाहर ला रहा है । सानिया इस देश की बेटियों के लिए आदर्श हैं , मैने खुद अपनी एक कविता मे उनका ज़िक्र किया है । कुछ साल पहले जब किसी मौलवी ने उनकी ड्रेस को लेकर फ़तवा दिया था तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ था । इसके अलावा भी सेलिब्रटी होने के कारण उनके बारे मे छोटी बड़ी बाते समाचार बनती ही रहती हैं । इस लिहाज से उनकी शादी पर चर्चा तो स्वाभाविक है और जब शादी एक पाकिस्तानी क्रिकेट स्टार से हो तो चर्चा और भी लाज़िमी है । लेकिन यह चर्चा खुशनुमा और पॉजिटिव के बज़ाय नेगेटिव हो रही है । इस खुशी की बात को नेगेटिव मोड़ पर लाने क्या क्या पहलू हैं , एक नज़र उनपर डालते हैं ।
सोहराब मिर्ज़ा पहलू :
सानिया की सगाई जुलाई ०९ मे सोहराब मिर्ज़ा से तय हुई , पूरे ज़श्न के माहौल मे , दोनो की तस्वीरें मीडिया मे आयीं , लेकिन सगाई छ: महीने मे टूट गयी , कारण का खुलासा नही हुआ । दोनो परिवारों ने केवल यह कहा कि सोहराब और सानिया दोनो ने अपनी इच्छा से अलग होने का फ़ैसला किया है । अब सानिया ने इस बात का खुलासा किया है कि अब से करीब छ: महीने पहले ( यानी सोहराब से सगाई के तीन महीने बाद ) से उनके और शोएब के बीच डेटिंग चल रही है । हमे सानिया की बात का विश्वास करना चाहिए , फिर भी भारतीय समाज के हिसाब से यह अजीब ही है कि सगाई के बाद सानिया किसी दूसरे के साथ डेटिंग कर रही थीं ।
या सच यह हो सकता है , जैसी कि अफ़वाह है , कि सानिया सोहराब से शादी करना ही नही चाहती थी , उन्हे शुरू से ही शोएब से शादी करनी थी लेकिन उनका परिवार उनके पाकिस्तान मे बसने और शादी के बाद टेनिस छोड़ देने की शोएब की शर्त मानने लिए तैयार नही था । इसके पीछे भारत पाकिस्तान के बीच के हालात भी एक कारण हो सकता है । इस लिए सोहराब जो कि एक पारिवारिक मित्र हैं उनसे सानिया की सगाई कर दी गयी । इस बात का इशारा कुछ महीने पहले के सानिया के एक इन्टरव्यू से मिलता है , जब उन्होने यह कहा था कि जब खेलना है तो शादी क्यों करें । लगता है कि सोहराब से सगाई के बाद शोएब तथा उनके परिवार पुनर्विचार करने पर मजबूर हुआ और इन दोनो बातों पर छूट देने के लिए राज़ी हो गया । इसी लिए यह बात जोर देकर कही गयी कि दोनो शादी के बाद दुबई मे रहेंगे और सानिया भारत के लिए खेलती रहेंगी । इससे भारत मे मौजूद पाकिस्तान विरोधी माहौल को सानिया विरोधी बनने से रोकने मे थोड़ी सहायता भी मिली है ।
लेकिन दोनो सूरतों मे सोहराब मिर्ज़ा के नज़रिये से देखें तो बेचारे इस्तेमाल ही हुए ।
राजनैतिक और सांप्रदायिक पहलू :
भारत मे कुछ राजनैतिक दल ( जैसे कि शिव सेना ), समाजवादी पार्टी के अबु आज़मी और कुछ अराजनैतिक हंगामा ग्रुप ( जैसे प्रमोद मुथालिक की श्री राम सेना ) जैसे लोग हैं जिनका एक ही काम है कि किसी भी मुद्दे को लेकर उसे या तो साम्प्रदायिक रंग दे देते हैं या उसे भारतीय संस्कृति पर हमला घोषित कर देते हैं । कोई किसी से शादी कर रहा है इसमे क्यों हाय तोबा । लेकिन अजीब बात है कि बाल ठाकरे जैसा व्यक्ति संपादकीय लिख रहा है , उनके कार्यकर्ता पोस्टर जला रहे हैं और सानिया को भारत से नही खेलने देने की घोषणा कर रहे हैं । बहुत दिनो से सोये पड़े प्रमोद मुथालिक को भी टीवी पर आने का मौका मिल गया ।
यह सब ज्यादा से ज्यादा मीडिया पोजिशनिंग से अधिक कुछ नही है । भारत मे आज के माहौल मे ऐसी बातों पर लोग थोड़ा बहुत कन्सर्न भले जता दें लिकिन उद्द्वेलित नही होते । इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस बात पर मामला गर्म रहेगा । वैसे भी शादी के बाद लडकी अपने ससुराल जाती ही है , यहां तो लड़की को पराया धन ( यानी पति के परिवार की ) मानते ही हैं । बस थोड़ी बहुत कसक यदि है तो वह पाकिस्तान को लेकर है , दूल्हा अगर पाकिस्तानी नही होता तो इनमे से किसी को अपनी राजनीति चमकाने का मौका नही मिलता । लेकिन अब इस बात को ज्यादा मुद्दा बनाने का कोई लाभ नहीं ।
आयशा सिद्दीक़ी पहलू :
आयशा हर टीवी चैनल पर छायी हुई हैं । उन्हे पूरी सहानुभूति भी मिल रही है । उन्होने इतना सबूत तो लोगों के सामने रख ही दिया है कि शोएब का चरित्र शक के दायरे मे आ गया है । अब यह तो साफ है कि निकाह हुआ था , अब शोएब की तरफ से यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि निकाह नामा तो है लेकिन प्रोसेस पूरा नही हुआ । इससे साफ जाहिर होता है कि दाल मे कुछ काला तो है । आज जब शोएब और सानिया एक पवित्र रिश्ते मे बंधने जा रहे हैं तो यह शक और धोखे का माहौल ठीक नहीं है । यदि सचमुच आयशा के साथ निकाह हुआ था तो यह शादी सानिया ,आयशा और कानून सब के साथ अन्याय होगा । इसलिए स्थिति साफ हो तो अच्छा होगा नही तो बाद मे इसका परिणाम ज्यादा दुखद हो सकता है ।
अंत मे शोएब पहलू :
शोएब मलिक की एक ही छबि हमारे मन मे बसी हुई है जब ट्वन्टी-ट्वन्टी विश्व कप के फाइनल मे भारत से हारने के बाद उन्होने पूरे दक्षिण एशिया के मुसलमानों से माफ़ी मागी थी कि उनके लिए वे विश्व कप नही जीत पाये , यानी उस भारत से हार गये जो हिंदू बहुल है । यह उस पाकिस्तानी मानसिकता को ज़ाहिर कर रहा था जो मानता है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान ही मुसलमानो का प्रतिनिधित्व कर सकता है ।
ऐसे व्यक्ति से क्या हम यह उम्मीद करें कि वे अपनी पत्नी को यह छूट देगें कि वे भारत की नागरिक बनी रहें , भारत के लिए खेले और मेडल जीते । लेकिन जब ऐसी घोषणा सानिया और शोएब दोनो ने किया है तो शायद हो सकता है कि शोएब बदल गये हैं या सानिया ने बदलने पर मजबूर कर दिया है या फिर बाद मे सानिया बदल जायेंगी । यह तो समय ही तय करेगा ।
आज तो केवल इतना ही : सानिया-शोएब को सुखी और सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएं । शायद इससे भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ मिठास आये ताकि सम्बन्ध अच्छे बने और आज जो नेगेटिव चर्चा है उसका परिणाम पॉजिटिव हो । आमीन ।
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
बुधवार, 31 मार्च 2010
रविवार, 28 मार्च 2010
डेविड कोलमैन हेडली की स्वीकारोक्ति ( ३ ) - परिप्रेक्ष : भारत का राजनैतिक व सामाजिक द्वंद
जब मैने इस लेख की पहली कड़ी में यह मुद्दा उठाया था कि डेविड एक डबल एजेंट था और अमेरिकी सुरक्षा एजेन्सीज उसे भारतीय एजेन्सीज को नही सौपेंगी , तो वह प्रारंभिक समाचारों पर आधारित एक विश्लेषणात्मक अनुमान था, अब यह बात सही साबित हो रही है । अमेरिकी प्रतिनिधियों ने इस तरह का बयान दे दिया है और भारत के गॄह मंत्री श्री पी चिदंबरम सफाई दे रहे हैं कि हम कोशिश जारी रखेंगे और निराश नहीं हैं , जब कि आज हर समझदार व्यक्ति जो थोड़ा बहुत भी अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखता है उसे पता है कि अब हैडली से भारत जो भी जानकारी पायेगा वह केवल वही होगी जो अमेरिकी चाहेंगे या जितना और जैसा चाहेंगे जिसे अंग्रेजी मे कहेंगे " सूटेबल टू अमेरिका " । इसके विपरीत हमने अमेरिकी एजेन्सीज को खुली छूट दिया कसाब से पूछ-ताछ करने के लिए । हमने इस आशा मे यह कदम उठाया था कि अमेरिका पाकिस्तान पर यह दबाव डालेगा कि वह २६/११ से जुड़े लोगों पर कानूनी कार्यवायी करे चाहे वे स्टेट एक्टर हों या नॉन स्टेट एक्टर हों , डेविड हैडली का एंगल तो तब चर्चा में था ही नही । आज हाल यह है कि ’न खुदा ही मिला न विसाले सनम’ , आज हमे पाकिस्तान भी बहला और घुमा रहा है और अमेरिका भी केवल मीठी मीठी बातें कर रहा है ठोस बात कुछ नही । भारत सरकार अपनी झेंप मिटाने के लिए कोशिश जारी रखने वाले बयान दे रही है । भारत सरकार कर भी क्या सकती है भारत के आर्थिक वर्चस्व मे वृद्धि के बावज़ूद हमारा स्थान हमेशा पाकिस्तान के साथ जोड़ कर ही देखा जाता है । भारत की आज तक की सभी सरकारें इसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि जैसे ही पाकिस्तान को अमेरिका कोई सहायता , आर्थिक या सामरिक , देता है हम चिल्लाना शुरू कर देते हैं । मै पूछता हूं क्यों भाई , आप क्यों अपने को पाकिस्तान से जोड़ते हो , उसे जो भी मिलता है मिलने दो , आप मे इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि हमारी जो भी जरूरते बढ़ेगीं वह हम अपने आन्तरिक सोर्स से पूरा कर लेगें । यह न होकर जब हम शोर मचाते हैं और वैसा ही पाकिस्तान भारत को लेकर शोर मचाता है, जो उसके हितों के हिसाब से सही भी है, ऐसे में अमेरिकी थिंक टैंक यह मान कर चलता है कि भारत और पाकिस्तान को अलग करके नही देखा जा सकता । यहां छुट-पुट प्रतीकात्मक बातों पर नही बल्कि संपूर्ण परिदॄश्य की बात हो रही है । इसीलिए अमेरिका पाकिस्तान पर न तो अपेक्षित दबाव बना रहा है न स्वंय ही भारत को २६/११ से जुड़ी जानकारियां खुले दिल से दे रहा है ।
इन परिस्थितियों मे भारत की सरकार मे शामिल राजनैतिक पार्टियों मुख्यतया कांग्रेस को इस फ्रसट्रेसन से निकलने का रास्ता चाहिए , वह रास्ता कैसे पाया जा रहा है यह दिखाई दे रहा है । इस पर चर्चा से पहले मै २६/११ हमले के समय के माहौल पर ध्यान दिलाना चाहूंगा । उस हमले ठीक पहले के समय एक शब्दावली का प्रयोग मीडिया मे उछाला जा रहा था ’सैफ्रन टेरॉर’ । यह एक प्रायोजित कार्यक्रम था जिसके द्वारा आतंकवाद का एक संतुलन बनाने का प्रयास किया जा रहा था । जी हां अगर इस्लामिक आतंकवाद की जुमला प्रचलित है जिसे हिंदूवादी दल प्रयोग करते हैं तो उसके जवाब में सैफ्रन आतंकवाद चुनावी साल मे ढूंढा गया । ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई थी कि उस दौरान बहुत सारी आतंक वादी घटनाएं हिंदूवादी ग्रुपों द्वारा की गयी और नागपुर एंगल रख कर उसे आर एस एस से भी जोड़ने की कोशिश हुई । पेड न्यूज के जमाने मे चुनाव जीतने के लिए ऐसे हथकंडों मे मीडिया का उपयोग भी भरपूर किया गया । यह शायद और बड़े स्तर पर होता लेकिन २६/११ ने फोकस वापस ला कर आतंक की मुख्य धारा पर केंद्रित कर दिया । जहां कांग्रेस अपने लिए माहौल बनाने मे प्रयासरत थी और भाजपा अपने वोट बैंक पर हमला होते देख मन मसोस रही थी , वहीं २६/११ ने अचानक ऐसा लगा कि पाशा पलट दिया , उसी दिन दिल्ली मे वोटिंग हो रही थी भाजपा को लाभ लेने की हड़बड़ी थी ऐसे मे गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी घटना स्थल पर पहुंच गये । यह कार्य एक राजनैतिक दल द्वारा राष्ट्र के दुख की घड़ी का राजनैतिक लाभ उठाने के नंगे प्रयास के तौर पर देखा गया । इस सोच ने पाशा पलट दिया , बहुसंख्यक वर्ग इस बात से बिदक गया , साथ ही मुस्लिम समुदाय ने अधिक से अधिक संख्या मे निकल कर वोट किया और भाजपा का गणित उलट गया । इससे यह भी जाहिर होता है कि राजनैतिक लाभ लेने के मामले मे कोई दूध का धुला नहीं है । २६/११ के बाद सैफ्रन आतंक की चर्चा दब गयी मामला ठंडे बस्ते मे है शायद कभी उचित परिस्थितियां आयें तो इसका चर्चा को उछाला जायेगा ।
आज जब कूटनीतिक स्तर पर २६/११ के मामले मे धक्का लगा तो वापस अयोध्या और गुजरात मामले को गर्माया जा रहा है । मुझे लगता है कि भारत के राजनैतिक दल सामजिक वैमनस्य को हवा देकर हमेशा महौल को अपने लाभ के हिसाब से गर्माये रखना चाहते हैं । जब भाजपा शासन मे थी तो हमने देखा कि कैसे १९८४ के सिख विरोधी दंगो और बोफोर्स की दलाली को गर्माया जाता था । कांग्रेस उसके जवाब मे गुजरात के मुद्दे को और कारगिल युद्ध के समय कॉफ़िन इम्पोर्ट की दलाली का मुद्दा उठाती थी । आज बोफोर्स को दफ़न कर दिया गया , उसकी दलाली का पैसा लंदन के बैंक से निकल जाने दिया गया , उसको लेकर कोई जिम्मेदारी फिक्स नही हुई किसी बाबू की भी नही । कॉफ़िन मामला भी साथ ही साथ दफ़न हो गया , क्योंकि उसमे कुछ खास था भी नहीं केवल एक ओडिट ऑबजेक्सन को राजनैतिक मुद्दा बनाया गया था । अब १९८४ के दंगे और अयोध्या के बाबरी और गुजरात के २००२ के दंगों के मामले पर तमाशा जारी है ।
साथ ही यह सवाल भी जायज़ है कि हम किस अधिकार से पाकिस्तान और अमेरिका से यह अपेक्षा करते हैं कि वे खुले दिल से २६/११ के दोषियों को पकड़ने मे हमारी सहायता करें और सजा दिलवायें जब कि हमारी सरकार यह खुलासा करने के लिए तैयार नहीं है कि २६/११ के आरोपियों की सहायता करने वाले लोकल कौन थे । लोकल मुस्लिमों के शामिल होने की तरफ पूरा इशारा है और सरकार इसके राजनैतिक दुश्प्रभाव का आकलन करके उसे छुपा रही है ।
इस पूरे परिदॄश्य से क्या समझा जाय कि भारत मे जो भी जांच होगी , जो न्यायिक प्रक्रिया होगी या जो भी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था होगी वह वोट बैंक को नज़र मे रख कर होगी , चाहे उससे हिंदू मुसलमान मे वैमनस्य बढ़े , चाहे हमारे इस विद्वेष का लाभ देश के बाहर बैठे दुश्मन कैसे भी उठावें ।
इन परिस्थितियों मे भारत की सरकार मे शामिल राजनैतिक पार्टियों मुख्यतया कांग्रेस को इस फ्रसट्रेसन से निकलने का रास्ता चाहिए , वह रास्ता कैसे पाया जा रहा है यह दिखाई दे रहा है । इस पर चर्चा से पहले मै २६/११ हमले के समय के माहौल पर ध्यान दिलाना चाहूंगा । उस हमले ठीक पहले के समय एक शब्दावली का प्रयोग मीडिया मे उछाला जा रहा था ’सैफ्रन टेरॉर’ । यह एक प्रायोजित कार्यक्रम था जिसके द्वारा आतंकवाद का एक संतुलन बनाने का प्रयास किया जा रहा था । जी हां अगर इस्लामिक आतंकवाद की जुमला प्रचलित है जिसे हिंदूवादी दल प्रयोग करते हैं तो उसके जवाब में सैफ्रन आतंकवाद चुनावी साल मे ढूंढा गया । ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई थी कि उस दौरान बहुत सारी आतंक वादी घटनाएं हिंदूवादी ग्रुपों द्वारा की गयी और नागपुर एंगल रख कर उसे आर एस एस से भी जोड़ने की कोशिश हुई । पेड न्यूज के जमाने मे चुनाव जीतने के लिए ऐसे हथकंडों मे मीडिया का उपयोग भी भरपूर किया गया । यह शायद और बड़े स्तर पर होता लेकिन २६/११ ने फोकस वापस ला कर आतंक की मुख्य धारा पर केंद्रित कर दिया । जहां कांग्रेस अपने लिए माहौल बनाने मे प्रयासरत थी और भाजपा अपने वोट बैंक पर हमला होते देख मन मसोस रही थी , वहीं २६/११ ने अचानक ऐसा लगा कि पाशा पलट दिया , उसी दिन दिल्ली मे वोटिंग हो रही थी भाजपा को लाभ लेने की हड़बड़ी थी ऐसे मे गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी घटना स्थल पर पहुंच गये । यह कार्य एक राजनैतिक दल द्वारा राष्ट्र के दुख की घड़ी का राजनैतिक लाभ उठाने के नंगे प्रयास के तौर पर देखा गया । इस सोच ने पाशा पलट दिया , बहुसंख्यक वर्ग इस बात से बिदक गया , साथ ही मुस्लिम समुदाय ने अधिक से अधिक संख्या मे निकल कर वोट किया और भाजपा का गणित उलट गया । इससे यह भी जाहिर होता है कि राजनैतिक लाभ लेने के मामले मे कोई दूध का धुला नहीं है । २६/११ के बाद सैफ्रन आतंक की चर्चा दब गयी मामला ठंडे बस्ते मे है शायद कभी उचित परिस्थितियां आयें तो इसका चर्चा को उछाला जायेगा ।
आज जब कूटनीतिक स्तर पर २६/११ के मामले मे धक्का लगा तो वापस अयोध्या और गुजरात मामले को गर्माया जा रहा है । मुझे लगता है कि भारत के राजनैतिक दल सामजिक वैमनस्य को हवा देकर हमेशा महौल को अपने लाभ के हिसाब से गर्माये रखना चाहते हैं । जब भाजपा शासन मे थी तो हमने देखा कि कैसे १९८४ के सिख विरोधी दंगो और बोफोर्स की दलाली को गर्माया जाता था । कांग्रेस उसके जवाब मे गुजरात के मुद्दे को और कारगिल युद्ध के समय कॉफ़िन इम्पोर्ट की दलाली का मुद्दा उठाती थी । आज बोफोर्स को दफ़न कर दिया गया , उसकी दलाली का पैसा लंदन के बैंक से निकल जाने दिया गया , उसको लेकर कोई जिम्मेदारी फिक्स नही हुई किसी बाबू की भी नही । कॉफ़िन मामला भी साथ ही साथ दफ़न हो गया , क्योंकि उसमे कुछ खास था भी नहीं केवल एक ओडिट ऑबजेक्सन को राजनैतिक मुद्दा बनाया गया था । अब १९८४ के दंगे और अयोध्या के बाबरी और गुजरात के २००२ के दंगों के मामले पर तमाशा जारी है ।
साथ ही यह सवाल भी जायज़ है कि हम किस अधिकार से पाकिस्तान और अमेरिका से यह अपेक्षा करते हैं कि वे खुले दिल से २६/११ के दोषियों को पकड़ने मे हमारी सहायता करें और सजा दिलवायें जब कि हमारी सरकार यह खुलासा करने के लिए तैयार नहीं है कि २६/११ के आरोपियों की सहायता करने वाले लोकल कौन थे । लोकल मुस्लिमों के शामिल होने की तरफ पूरा इशारा है और सरकार इसके राजनैतिक दुश्प्रभाव का आकलन करके उसे छुपा रही है ।
इस पूरे परिदॄश्य से क्या समझा जाय कि भारत मे जो भी जांच होगी , जो न्यायिक प्रक्रिया होगी या जो भी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था होगी वह वोट बैंक को नज़र मे रख कर होगी , चाहे उससे हिंदू मुसलमान मे वैमनस्य बढ़े , चाहे हमारे इस विद्वेष का लाभ देश के बाहर बैठे दुश्मन कैसे भी उठावें ।
बुधवार, 24 मार्च 2010
राम - कृपानिधान ( राम नवमी के अवसर पर - एक दॄष्टिकोण )
प्रभु श्री राम पर कितना कुछ सब को पता है और कितना लिखा - पढ़ा जाता है इसे शब्दों मे बांधना एक साधारण मनुष्य के लिए अकल्पनीय है । दिन भर जाने अनजाने हम राम का स्मरण करते हैं । ऐसे मे मेरे जैसे एक साधारण व्यक्ति के लिए उनके जीवन चरित या महिमा की विवेचना , वह भी सीमित शब्दों मे थोड़ा मुश्किल सा लगता है । राम के कॄपानिधान रूप पर चर्चा करते हुए आज मै राम की उस प्रतिज्ञा को स्मरण करना चाहता हूं जो अक्सर ज्यादा चर्चित नहीं होती । इस घटना का ज़िक्र अरण्य कांड मे आता है ।
प्रभु श्री राम , लक्ष्मण और सीता जी चित्रकूट छोड़ कर वन के भीतरी भाग मे प्रवेश कर रहे हैं । वे सब ॠषि सरभंग के आश्रम मे पहुंचते हैं, वहां पर एक ऐसी घटना घटित होती है जो रामचरित मानस में अपनी तरह से अनूठी है । यहां ॠषि सरभंग श्री राम के स्वागत और सम्मान के बाद अपने तपोबल से उत्पन्न अग्नि मे जल कर प्राण त्याग देते हैं । उसके ठीक बाद आश्रम के पास अस्थियों का पहाड़ देख कर जब श्री राम के प्रश्न करने पर अन्य ऋषि लोग श्री राम को बताते हैं कि यह पहाड़ उन मुनियों की अस्थियों से बना है जिन्हे राक्षसों ने मार दिया है तो यह सुन कर प्रभु के नेत्रों मे आंसू भर आये और उन्होंने प्रतिज्ञा किया :
निशिचर हीन करहुं महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह ।
सकल मुनिन्ह के आश्रमहिं जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥
यह वह घटना है जो प्रभु के कॄपानिधान और दया सिंधु रूप को सामने लाती है । इस घटना के प्रभाव और महत्व को समझने के लिए हमे यह ध्यान देना होगा कि उस समय क्या हुआ होगा और उस समय क्या राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियां थी ।
ऐसा लगता है कि ॠषि सरभंग ने शायद राम का ध्यान पूरी तरह मुनियों और तपस्वियों की तकलीफों की तरह आकर्षित करने के लिए अग्नि समाधि ले ली इसे आप आत्म दाह भी कह सकते हैं । यह पूरी तरह से पूर्व नियोजित होगा क्यों कि रावण की लंका जैसे विकसित और शक्तिशाली साम्राज्य के मुकाबले अयोध्या ही दूसरा साम्राज्य था जो उसे परास्त कर सकता था । राम की कीर्ति अहिल्या उद्धार जहां राम दकियानूसी सामाजिक कुरीतियों से शापित अहिल्या को प्रतिस्थापित करते हैं ( इस पर चर्चा कभी फिर ) , विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के समय और बाद मे सीता विवाह के समय शिव धनुष भंग आदि से पूरी तरह फैल चुकी थी, वे ही एक मात्र विकल्प जान पड़ते थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी से नीरीह मुनियों के समाज को हर समय मौत के ग्रास बनने और भय और आतंक मे जीने के अभिशाप से मुक्ति दे सकने मे सक्षम थे । यदि बिना परिस्थिति को पूरी तरह समझे राम वहां से आगे चले जाते तो यह अवसर शायद फिर से नहीं मिलता । इसलिए यह स्वाभविक ही लगता है कि ॠषि सरभंग ने पूरे समाज के कल्याण के लिए राम का ध्यान पूरी तरह आकर्षित करना चाहते थे और इस लिए उन्होने अपने आप को न्यौछावर कर दिया । इस बात का प्रभु राम पर वांछित असर भी पड़ा और उन्होने आस पास के बारे मे पूरी जानकारी ली और वस्तुस्थिति से अवगत होने पर उनका मन ऐसा द्रवित हुआ कि उनके नेत्र भर आये । उन्होने दोनो हाथ उठा कर यह प्रतिज्ञा की कि धर्मपारायण जीवन यापन करने वाले निरीह मुनियों की अकारण हत्या करने और आतंकित करने वाले इन आतताइयों से इस पॄथ्वी को मुक्त कर दूंगा । यह किसी एक व्यक्ति या समूह को राहत देने की प्रतिज्ञा नहीं थी । यह पूरी पॄथ्वी को आतंक के राज से मुक्ति की प्रतिज्ञा थी । इसके बाद प्रभु सब मुनियों के आश्रमों मे गये और एक एक को ढ़ाढ़स दिया ।
यह घटना राम के शेष वनवास के दिनों के लिए जो उनका उद्देश्य था उसको सार्थक करने मे एक महती भूमिका निभाती है । अब आप पूरी तरह अन्दाजा लगा सकते हैं कि आगे की घटनाएं इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए या तो स्वाभाविक तौर पर हुई होगीं या कुछ को प्रायोजित किया गया होगा । संक्षेप मे नीचे दी गयी बातें विचारणीय हैं :
१. क्या राम विश्वामित्र मित्र के आश्रम मे इसी अन्तिम संकल्प मे सफलता के लिए तैयारी के लिए युद्ध विद्या सीखने गये थे । विवाहोपरान्त राज्य प्रबंध संभालने से पहले इन आततायियों का समूल नाश आवश्यक था । क्या राम का वनवास इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए था ।
२. क्या भरत राम से मिलने पूरी सेना के साथ इस लिए वन गये क्यों कि वे चाहते थे कि यदि राम को सैन्य बल की आवश्यकता हो तो अयोध्या उसके लिए तैयार है और राम वन के प्रथम छोर चित्रकूट से आगे बढ़कर वन के भीतरी भाग मे स्थित मुख्य लक्ष्य तक पहुंचने मे देर न करें । राम इस युद्ध को स्थानीय वनवासियों की सहायता से ही लड़ना चाहते थे और उसके लिए उचित कारण भी चाहते थे जिससे रावण को किसी भी हालात मे पीड़ित होने और बाहरी शत्रु के आक्रमण का आरोप लगाने का अवसर न मिले । क्या इसी लिए भरत के जाने के बाद राम ने चित्रकूट छोड़ दिया और वन के अत्यन्त भीतरी भाग मे प्रवेश कर गये ।
सीता हरण वह नैतिक कारण बना और सुग्रीव के रूप मे स्थानीय लोगों की सहायता मिली जिसने रावण को सहानुभूति का पात्र नहीं बनने दिया, चाहे इसके लिए परिस्थितियां निर्माण हुईं या की गयीं । राम रावण युद्ध एक आततायी साम्राज्य के विनाश के लिए हुआ जिसने एक ऐसे क्षेत्र मे यानी वनांचल मे मौत, भय और आतंक का राज फ़ैला रखा था ,जहां शायद पूरी तरह अयोध्या साम्राज्य का अधिकार नहीं था और जो शायद रावण के अधिकार में भी नहीं था, जबकि खर और दूषण की चौकी इस क्षेत्र मे स्थापित थी । ऐसे मे रावण राज को इस तरह के राजनैतिक और नैतिक हथियार से मारने की आवश्यकता पड़ी जो केवल सीधे युद्ध जीत कर नहीं प्राप्त की जा सकती थी । एक बात और रावण युद्ध के बाद या कहें उसके पहले ही राम ने विभीषण को लंका का राजा घोषित करके यह स्पष्ट कर दिया था कि लंका पर जीत का अर्थ अयोध्या के साम्राज्य का विस्तार नहीं होकर एक आततायी साम्राज्य व उसके तंत्र का अन्त ही था और राज सत्ता स्थानीय लोगों के पास ही रहेगी ।
इन सारी बातों के बावज़ूद उपर्युक्त घटना का यह महत्व है कि राम शायद स्थानीय लोगों के दुखों को अपनी आखों से देखने के बाद इतने द्रवित हुए कि उन्होने यह प्रतिज्ञा की , यही बातें अयोध्या मे उन्हे बताई गयी थीं मगर कानो सुनी होने के कारण उतनी असरकारक नहीं हुई होगीं । अत: यह घटना राम को अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए प्रेरित करती है और राम - रावण युद्ध का निर्णायक कारक बन कर उभरती है तथा राम के कॄपानिधान रूप को भी उभारती है ।
आज भी हम ऐसे ही आतंकवाद के दौर से गुजर रहे हैं जब नीरीह लोग बेवजह मारे जा रहे हैं , आतंकवाद एक पूर्ण विकसित साम्राज्य द्वारा प्रायोजित है और ऐसे क्षेत्र मे केंद्रित है जहां भारत पूरी तरह अपना अधिकार नहीं कर पा रहा और कई खर दूषण अपनी चौकी स्थापित किये बैठे हैं । इसका इलाज आतंक के तंत्र के समूल विनाश से ही होगा और उसके लिए राम जैसे त्याग व राजनैतिक कौशल की आवश्यकता होगी जहां हम विस्तारवादी से हट कर सुधारवादी भूमिका मे स्थानीय लोगों को प्रेरित करके उनका साथ प्राप्त कर सकें ।
प्रभु श्री राम , लक्ष्मण और सीता जी चित्रकूट छोड़ कर वन के भीतरी भाग मे प्रवेश कर रहे हैं । वे सब ॠषि सरभंग के आश्रम मे पहुंचते हैं, वहां पर एक ऐसी घटना घटित होती है जो रामचरित मानस में अपनी तरह से अनूठी है । यहां ॠषि सरभंग श्री राम के स्वागत और सम्मान के बाद अपने तपोबल से उत्पन्न अग्नि मे जल कर प्राण त्याग देते हैं । उसके ठीक बाद आश्रम के पास अस्थियों का पहाड़ देख कर जब श्री राम के प्रश्न करने पर अन्य ऋषि लोग श्री राम को बताते हैं कि यह पहाड़ उन मुनियों की अस्थियों से बना है जिन्हे राक्षसों ने मार दिया है तो यह सुन कर प्रभु के नेत्रों मे आंसू भर आये और उन्होंने प्रतिज्ञा किया :
निशिचर हीन करहुं महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह ।
सकल मुनिन्ह के आश्रमहिं जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥
यह वह घटना है जो प्रभु के कॄपानिधान और दया सिंधु रूप को सामने लाती है । इस घटना के प्रभाव और महत्व को समझने के लिए हमे यह ध्यान देना होगा कि उस समय क्या हुआ होगा और उस समय क्या राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियां थी ।
ऐसा लगता है कि ॠषि सरभंग ने शायद राम का ध्यान पूरी तरह मुनियों और तपस्वियों की तकलीफों की तरह आकर्षित करने के लिए अग्नि समाधि ले ली इसे आप आत्म दाह भी कह सकते हैं । यह पूरी तरह से पूर्व नियोजित होगा क्यों कि रावण की लंका जैसे विकसित और शक्तिशाली साम्राज्य के मुकाबले अयोध्या ही दूसरा साम्राज्य था जो उसे परास्त कर सकता था । राम की कीर्ति अहिल्या उद्धार जहां राम दकियानूसी सामाजिक कुरीतियों से शापित अहिल्या को प्रतिस्थापित करते हैं ( इस पर चर्चा कभी फिर ) , विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के समय और बाद मे सीता विवाह के समय शिव धनुष भंग आदि से पूरी तरह फैल चुकी थी, वे ही एक मात्र विकल्प जान पड़ते थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी से नीरीह मुनियों के समाज को हर समय मौत के ग्रास बनने और भय और आतंक मे जीने के अभिशाप से मुक्ति दे सकने मे सक्षम थे । यदि बिना परिस्थिति को पूरी तरह समझे राम वहां से आगे चले जाते तो यह अवसर शायद फिर से नहीं मिलता । इसलिए यह स्वाभविक ही लगता है कि ॠषि सरभंग ने पूरे समाज के कल्याण के लिए राम का ध्यान पूरी तरह आकर्षित करना चाहते थे और इस लिए उन्होने अपने आप को न्यौछावर कर दिया । इस बात का प्रभु राम पर वांछित असर भी पड़ा और उन्होने आस पास के बारे मे पूरी जानकारी ली और वस्तुस्थिति से अवगत होने पर उनका मन ऐसा द्रवित हुआ कि उनके नेत्र भर आये । उन्होने दोनो हाथ उठा कर यह प्रतिज्ञा की कि धर्मपारायण जीवन यापन करने वाले निरीह मुनियों की अकारण हत्या करने और आतंकित करने वाले इन आतताइयों से इस पॄथ्वी को मुक्त कर दूंगा । यह किसी एक व्यक्ति या समूह को राहत देने की प्रतिज्ञा नहीं थी । यह पूरी पॄथ्वी को आतंक के राज से मुक्ति की प्रतिज्ञा थी । इसके बाद प्रभु सब मुनियों के आश्रमों मे गये और एक एक को ढ़ाढ़स दिया ।
यह घटना राम के शेष वनवास के दिनों के लिए जो उनका उद्देश्य था उसको सार्थक करने मे एक महती भूमिका निभाती है । अब आप पूरी तरह अन्दाजा लगा सकते हैं कि आगे की घटनाएं इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए या तो स्वाभाविक तौर पर हुई होगीं या कुछ को प्रायोजित किया गया होगा । संक्षेप मे नीचे दी गयी बातें विचारणीय हैं :
१. क्या राम विश्वामित्र मित्र के आश्रम मे इसी अन्तिम संकल्प मे सफलता के लिए तैयारी के लिए युद्ध विद्या सीखने गये थे । विवाहोपरान्त राज्य प्रबंध संभालने से पहले इन आततायियों का समूल नाश आवश्यक था । क्या राम का वनवास इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए था ।
२. क्या भरत राम से मिलने पूरी सेना के साथ इस लिए वन गये क्यों कि वे चाहते थे कि यदि राम को सैन्य बल की आवश्यकता हो तो अयोध्या उसके लिए तैयार है और राम वन के प्रथम छोर चित्रकूट से आगे बढ़कर वन के भीतरी भाग मे स्थित मुख्य लक्ष्य तक पहुंचने मे देर न करें । राम इस युद्ध को स्थानीय वनवासियों की सहायता से ही लड़ना चाहते थे और उसके लिए उचित कारण भी चाहते थे जिससे रावण को किसी भी हालात मे पीड़ित होने और बाहरी शत्रु के आक्रमण का आरोप लगाने का अवसर न मिले । क्या इसी लिए भरत के जाने के बाद राम ने चित्रकूट छोड़ दिया और वन के अत्यन्त भीतरी भाग मे प्रवेश कर गये ।
सीता हरण वह नैतिक कारण बना और सुग्रीव के रूप मे स्थानीय लोगों की सहायता मिली जिसने रावण को सहानुभूति का पात्र नहीं बनने दिया, चाहे इसके लिए परिस्थितियां निर्माण हुईं या की गयीं । राम रावण युद्ध एक आततायी साम्राज्य के विनाश के लिए हुआ जिसने एक ऐसे क्षेत्र मे यानी वनांचल मे मौत, भय और आतंक का राज फ़ैला रखा था ,जहां शायद पूरी तरह अयोध्या साम्राज्य का अधिकार नहीं था और जो शायद रावण के अधिकार में भी नहीं था, जबकि खर और दूषण की चौकी इस क्षेत्र मे स्थापित थी । ऐसे मे रावण राज को इस तरह के राजनैतिक और नैतिक हथियार से मारने की आवश्यकता पड़ी जो केवल सीधे युद्ध जीत कर नहीं प्राप्त की जा सकती थी । एक बात और रावण युद्ध के बाद या कहें उसके पहले ही राम ने विभीषण को लंका का राजा घोषित करके यह स्पष्ट कर दिया था कि लंका पर जीत का अर्थ अयोध्या के साम्राज्य का विस्तार नहीं होकर एक आततायी साम्राज्य व उसके तंत्र का अन्त ही था और राज सत्ता स्थानीय लोगों के पास ही रहेगी ।
इन सारी बातों के बावज़ूद उपर्युक्त घटना का यह महत्व है कि राम शायद स्थानीय लोगों के दुखों को अपनी आखों से देखने के बाद इतने द्रवित हुए कि उन्होने यह प्रतिज्ञा की , यही बातें अयोध्या मे उन्हे बताई गयी थीं मगर कानो सुनी होने के कारण उतनी असरकारक नहीं हुई होगीं । अत: यह घटना राम को अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए प्रेरित करती है और राम - रावण युद्ध का निर्णायक कारक बन कर उभरती है तथा राम के कॄपानिधान रूप को भी उभारती है ।
आज भी हम ऐसे ही आतंकवाद के दौर से गुजर रहे हैं जब नीरीह लोग बेवजह मारे जा रहे हैं , आतंकवाद एक पूर्ण विकसित साम्राज्य द्वारा प्रायोजित है और ऐसे क्षेत्र मे केंद्रित है जहां भारत पूरी तरह अपना अधिकार नहीं कर पा रहा और कई खर दूषण अपनी चौकी स्थापित किये बैठे हैं । इसका इलाज आतंक के तंत्र के समूल विनाश से ही होगा और उसके लिए राम जैसे त्याग व राजनैतिक कौशल की आवश्यकता होगी जहां हम विस्तारवादी से हट कर सुधारवादी भूमिका मे स्थानीय लोगों को प्रेरित करके उनका साथ प्राप्त कर सकें ।
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